MP में बच्चों की मोबाइल लत छुड़ाने वाला पायलट प्रोजेक्ट ठप, आयुष विभाग ने मुहैया कराई थी काउंसलिंग सुविधा व दवाएं
बच्चों में मोबाइल और इंटरनेट की लत गंभीर समस्या बन गई है, जिससे आत्मघाती कदम उठाने के मामले भी सामने ...और पढ़ें

मोबाइल की लत का शिकार बच्चा (प्रतीकात्मक चित्र)

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राज्य ब्यूरो, भोपाल। बच्चों में मोबाइल और इंटरनेट मीडिया देखने की लत तेजी से गंभीर समस्या बनती जा रही है। पिछले एक वर्ष में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां माता-पिता ने मोबाइल नहीं दिया या इस्तेमाल रोकने की कोशिश की, तो बच्चे ने आत्मघाती कदम उठा लिया। इंटरनेट की सहज उपलब्धता और लगातार बढ़ती डिजिटल पहुंच के चलते यह समस्या दिन-ब-दिन गहरी होती जा रही है।
हालांकि, रोकथाम के प्रयास अभी भी पर्याप्त नहीं हैं। ना तो परिवार स्तर पर, ना ही सरकारी स्तर पर। इसी को देखते हुए आयुष विभाग ने प्रदेश के शाजापुर और उज्जैन में बच्चों में मोबाइल की लत और अन्य मानसिक समस्याओं को दूर करने के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था। इसमें शिशु रोग में एमडी डॉक्टरों द्वारा बच्चों की काउंसलिंग की जा रही थी और 13 तरह की होम्योपैथिक दवाओं का संयोजन दिया जा रहा था। भोपाल के शासकीय होम्योपैथी कॉलेज को इस कार्यक्रम का संचालन सौंपा गया था।
प्रत्येक डॉक्टर बच्चों की लत और मानसिक स्थिति के आधार पर उनकी 'लत की ग्रेडिंग' करते थे और उसके अनुसार दवाएं देते थे। माता-पिता से संवाद कर उन्हें बच्चों की आदतों और मानसिक स्थिति के प्रति जागरूक किया जाता था। डॉक्टरों के अनुसार इस पायलट प्रोजेक्ट से अच्छे परिणाम भी मिले थे।
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होम्योपैथी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एसके मिश्रा ने बताया कि कई अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि बच्चों में मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिसमें मोबाइल और इंटरनेट की लत प्रमुख कारण है। इससे बच्चों को आंख और दांत से जुड़ी समस्याएं भी हो रही हैं।
डॉ. मिश्रा ने बताया कि पायलट प्रोजेक्ट एक वर्ष का था और इसे प्रदेश भर में लागू करने के लिए आयुष संचालनालय को प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन स्वीकृति नहीं मिली। एक बार फिर प्रस्ताव भेजा जाएगा, ताकि बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
