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MP के सरकारी कॉलेजों में पढ़ाई पर संकट: सहायक प्राध्यापकों के 55% पद खाली, 100 से ज्यादा प्राध्यापक पढ़ाने के बजाय दफ्तरों में टिके

Published: Sun, 01 Nov 2026 07:22 PM (IST)

मध्य प्रदेश के सरकारी कॉलेजों में शिक्षकों की भारी कमी है, जहां 55% सहायक प्राध्यापकों के पद खाली हैं। 100 ...और पढ़ें

-प्रतीकात्मक चित्र।

-प्रतीकात्मक चित्र।

HighLights

  1. एमपी कॉलेजों में 55% सहायक प्राध्यापक पद रिक्त।

  2. 100 से अधिक शिक्षक कार्यालयों में प्रतिनियुक्ति पर।

  3. शिक्षकों की कमी से पढ़ाई और नए पाठ्यक्रम प्रभावित।

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्य प्रदेश के सरकारी कॉलेजों में शिक्षकों की कमी का असर पढ़ाई और नए पाठ्यक्रमों के संचालन पर पड़ रहा है। प्रदेश के 571 शासकीय महाविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों के 7,078 पद खाली हैं, वहीं दूसरी ओर 100 से अधिक सहायक प्राध्यापक और प्राध्यापक कॉलेजों में पढ़ाने के बजाय मंत्रालय, सतपुड़ा भवन और दूसरे विभागीय कार्यालयों में प्रतिनियुक्ति या संलग्नीकरण पर काम कर रहे हैं। इससे कॉलेजों में उपलब्ध शिक्षकों की संख्या और कम हो रही है।

इसकी एक तस्वीर भोपाल के शासकीय मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय (एमवीएम) में भी दिखाई देती है। यहां प्राध्यापकों के 70 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से करीब 20 रिक्त हैं। शेष 50 उपलब्ध प्राध्यापकों में से तीन अतिरिक्त संचालक कार्यालय, सतपुड़ा भवन और मंत्रालय में प्रतिनियुक्ति पर हैं। प्रदेश के कई अन्य सरकारी कॉलेजों में भी ऐसी ही स्थिति बनी हुई है।

चार पद स्वीकृत, विभागीय कार्यालयों में 40 से ज्यादा शिक्षक तैनात

सतपुड़ा भवन और वल्लभ भवन में प्रशासनिक कामकाज के लिए केवल चार पद स्वीकृत हैं, लेकिन यहां 40 से अधिक प्राध्यापक और सहायक प्राध्यापक प्रतिनियुक्ति या संलग्नीकरण पर सेवाएं दे रहे हैं। इनमें कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं, जो नियुक्ति के शुरुआती वर्षों से ही कॉलेजों के बजाय विभागीय कार्यालयों में काम कर रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2019 में नियुक्त हुए 10 से अधिक सहायक प्राध्यापक अब तक विभागीय कामकाज में लगे हैं। इनकी जिम्मेदारियों में विभागीय नीति और नियमों का क्रियान्वयन, शिक्षकों की गोपनीय चरित्रावली (सीआर), योजनाओं की निगरानी और कॉलेजों के निरीक्षण से जुड़ी रिपोर्ट तैयार करना शामिल है। इस तरह इनका अधिकांश समय प्रशासनिक कार्यों में बीत रहा है।

कॉलेजों में 77 प्रतिशत प्राध्यापक पद भी खाली

प्रदेश के सरकारी कॉलेजों में शिक्षकों के रिक्त पदों की स्थिति चिंताजनक है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, सहायक प्राध्यापक के 12,895 स्वीकृत पदों में से 7,078 खाली हैं। यानी करीब 55 प्रतिशत पदों पर नियुक्ति नहीं है। वहीं, प्राध्यापक के 848 स्वीकृत पदों में से 650 पद रिक्त हैं। यह कुल पदों का लगभग 77 प्रतिशत है।

ऐसे में एक ओर कॉलेजों में नियमित शिक्षण के लिए पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, वहीं दूसरी ओर उपलब्ध शिक्षकों का बड़ा हिस्सा विभागीय और प्रशासनिक कार्यालयों में काम कर रहा है।

शिक्षण कार्य से दूर रहकर भी वरिष्ठ वेतनमान का लाभ?

शिक्षकों की विभागीय प्रतिनियुक्ति का असर उनके सेवा संबंधी मूल्यांकन पर भी सवाल खड़े कर रहा है। यूजीसी के प्रावधानों के अनुसार, शिक्षकों की परिवीक्षा अवधि सामान्यतः दो से तीन वर्ष में शिक्षण कार्य और प्रदर्शन के आधार पर पूरी होती है। इसके बाद वरिष्ठ वेतनमान यानी पे मैट्रिक्स-11 के लिए निर्धारित शिक्षण अनुभव जरूरी होता है।

नियमों के मुताबिक, पीएचडी धारकों के लिए चार वर्ष, एमफिल धारकों के लिए पांच वर्ष और नेट-सेट उत्तीर्ण शिक्षकों के लिए छह वर्ष का शिक्षण अनुभव आवश्यक है। अगले वेतनमान के लिए भी निर्धारित शिक्षण अनुभव की शर्त लागू होती है। ऐसे में लंबे समय से कॉलेजों में नियमित अध्यापन नहीं कर रहे शिक्षकों की परिवीक्षा अवधि और शिक्षण अनुभव का आकलन किस आधार पर किया जा रहा है, यह अहम सवाल है।

मंत्रियों के कार्यालयों और अन्य संस्थानों में भी शिक्षक तैनात

कॉलेजों से बाहर विभागीय कामकाज में लगे शिक्षकों में कुछ नाम मंत्रियों के कार्यालयों और अन्य संस्थानों से भी जुड़े हैं। संस्कृति मंत्री के यहां सहायक प्राध्यापक सत्येंद्र नरवरिया, संस्कृति विभाग में प्राध्यापक धर्मेंद्र पारे और स्वराज संस्था में एसके वर्मा कई वर्षों से पदस्थ बताए गए हैं।

इसके अलावा सतपुड़ा भवन में अविनाश प्रताप सिंह, शैलेंद्र कुमार मेश्राम, जैनुलुद्दीन जिलानी, डॉ. विजय श्री बौद्ध, अरुण कुमार गौतम, पूर्णिमा लोधावल, तुलसीराम दहायत, डॉ. अजय कुमार भारद्वाज, डॉ. मनीषा शर्मा, डॉ. राजेंद्र कुमार जुगादे, डॉ. अमर कुमार नायक, एसबी गुप्ता, डॉ. राकेश कुमार श्रीवास्तव, डॉ. उषा नायर, डॉ. संतोष भार्गव, डॉ. मनोज सिंह, डॉ. आलोक निगम, डॉ. कैलाश कुमार कुंभारे, डॉ. दिवा मिश्रा, डॉ. पीके सिरोठिया, डॉ. राजेश पाठक, डॉ. योगेंद्र वर्मा, पंकज अहिरवार, डॉ. नीलम वासनिक और डॉ. आजाद मंसूरी सहित कई शिक्षक प्रतिनियुक्ति या संलग्नीकरण पर कार्यरत बताए गए हैं।

कॉलेजों में हजारों पद खाली होने के बीच शिक्षकों की इस तरह की तैनाती ने उच्च शिक्षा विभाग की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब महाविद्यालयों में नियमित पढ़ाई के लिए शिक्षकों की जरूरत है, तो इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों को विभागीय कार्यालयों में तैनात रखने की आवश्यकता क्यों है?

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यह है स्थिति

पद--स्वीकृत -रिक्त -कार्यरत
संचालक,उत्कृष्टता संस्थान (स्नातकोत्तर प्राचार्य के समकक्ष)--1 -0 -1
स्नातकोत्तर प्राचार्य --98 -93 -5
स्नातक प्राचार्य -- 469 -461 -8
प्राध्यापक (सीधी भर्ती)--848 -650 -198
सहायक प्राध्यापक --12,895 -7,078 -5,817
ग्रंथपाल -582 -351 -231
क्रीड़ा अधिकारी -543 -325 -218
रजिस्ट्रार -45 -45 -0
कुल योग -15,481 -9,004 -6,477
(स्रोतः उच्च शिक्षा विभाग)

मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से सतत भर्ती प्रक्रिया जारी है। 3,600 पदों को स्वीकृति के लिए वित्त विभाग को भेजा गया है। स्वीकृति प्राप्त होते ही भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ कर दी जाएगी।
- इंदर सिंह परमार, उच्च शिक्षा मंत्री, मध्य प्रदेश

महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में खाली पदों को भरा जा रहा है। कुछ प्राध्यापकों को मंत्रालय या सतपुड़ा में प्रतिनियुक्ति दी गई है, ताकि प्रशासनिक कार्य प्रभावित न हो। शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित न हो, इसके लिए अतिथि विद्वानों को रखा गया है।
- अनुपम राजन, अपर मुख्य सचिव, उच्च शिक्षा विभाग

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