कहां गुम हो गई चंपा : नदी का सीना छलनी करते रहे खनन करने वाले, सिसकती रही चंपा, सिस्टम बना रहा अंधा

एक तरफ जहां खनन माफिया ने चंपा नदी को छलनी किया वहीं दूसरी तरफ नगर निगम कूड़े से इसके किनारे को पाटता रहा। चंपा के किनारे पर अब कूड़े के ऊंचे-ऊंचे टील बन गए हैं।

By Dilip ShuklaEdited By: Publish:Tue, 26 Nov 2019 08:34 AM (IST) Updated:Tue, 26 Nov 2019 08:34 AM (IST)
कहां गुम हो गई चंपा : नदी का सीना छलनी करते रहे खनन करने वाले, सिसकती रही चंपा, सिस्टम बना रहा अंधा
कहां गुम हो गई चंपा : नदी का सीना छलनी करते रहे खनन करने वाले, सिसकती रही चंपा, सिस्टम बना रहा अंधा

भागलपुर [संजय कुमार सिंह]। पिछले 20 सालों से चंपा सिसक-सिसक कर दम तोड़ रही है और सिस्टम है कि अंधा बना हुआ है। पर्यावरण की लंबी-चौड़ी बातें करने वाले अफसरों ने भी इसे नदी से नाला बनते देख कभी शर्म महसूस नहीं की। बालू माफिया कानून को ताक पर रख जेसीबी से इसकी छाती छलनी करते रहे। नगर निगम शहर भर का कूड़ा गिराता रहा। नतीजा यह हुआ कि तट पर मौजूद विशालकाय पेड़ सूख गए। पङ्क्षरदे दूर चले गए। मछलियों और अन्य जलीय जीवों ने भी धाराओं का साथ छोड़ दिया। इस तरह एक नदी का जीवन खत्म सा हो गया।

खनन नियमों की धज्जियां उड़ती रहीं

ऐसा नहीं कि खनिज विभाग के अधिकारी, पुलिस और जिला प्रशासन के लोग इससे अनभिज्ञ थे। सब कुछ उनके सामने था, पर जुबान बंद थी। वजह क्या थी, यह शोध का विषय है। बालू खनन अधिनियम में यह साफ लिखा है कि नियम का पालन नहीं करने वाली कंपनी पर मुकदमा होगा। आज तक कंपनी पर एक भी मुकदमा विभाग ने दर्ज नहीं कराया। विभाग की मौन सहमति रही और खनन करने वालों ने अंधरी (चंपा) नदी में दराधी के पास करीब डेढ़ किमी तक नदी के बांध को ही काट कर बेच दिया।

अधिकारियों ने देखना तक मुनासिब नहीं समझा

भागलपुर जिले में पिछले दस वर्षों से मुरादाबाद की कंपनी सैनिक फूड लिमिटेड के पास खनन का टेंडर था। कंपनी को चानन नदी, गेरूआ, अंधरी (चंपा) और गंगा के कुछ क्षेत्र में खनन करना था। अधिकारी कभी देखने तक नहीं गए कि खनन करने वाले मानक का पालन कर रहे हैैं या नहीं। खनन नियमों की धज्जियां उड़ती रहीं और विभाग आंखे मूंदे रहा।

नदी पर ही बना दिया डंपिंग ग्राउंड

एक तरफ जहां खनन माफिया ने चंपा नदी को छलनी किया, वहीं दूसरी तरफ नगर निगम कूड़े से इसके किनारे को पाटता रहा। चंपा के किनारे पर अब कूड़े के ऊंचे-ऊंचे टील बन गए हैं। इतना ही नहीं, साल भर पहले नगर निगम ने जहां डंपिंग ग्राउंड बनाया, वहां चंपा की संगनी रही महमूदा धार बहती है। अब महमूदा नदी में कूड़ा फेंका जा रहा है। इस मुद्दे पर भी सभी चुप रहे। यहीं नहीं इलाके के किसी जनप्रतिनिधि ने भी आवाज तो दूर चू तक नहीं की। सभी सफेद लकलक कुर्ता पहन राजनीतिक गोटियां लाल करते रहे।

मजदूरों का भी हुआ पलायन

खनन नियमावली बनी तो उसमें स्पष्ट लिखा गया कि खनन में मजदूरों को लगाया जाए। खनन फावड़े और बेलचा से हो। ताकि नदी को नुकसान न हो। इससे स्थानीय मजदूरों को रोजगार भी मिलेगा, लेकिन इसका पालन नहीं किया जा रहा। जेसीबी से खनन किया जा रहा है। इस कारण बड़ी संख्या में मजदूरों का रोजगार भी छिन गया। बताते हैैं जिस इलाके में खनन हुआ उस इलाके के मजदूर दूसरी जगह जाकर काम करते हैैं।

खनन के नियम

- नदी तल से खनन की अधिकतम गहराई उस समय बिना खोदाई वाले तल स्तर से तीन मीटर अथवा जल स्तर जो भी कम हो, अधिक नहीं होगी।

-उत्खनन के दौरान निर्मित सभी गड्ढे नियमित आधार पर भर दिए जाएंगे।

-नदी तल तक एप्रोच रोड का निर्माण बंदोबस्तधारी करेंगे।

-पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के अपनाते हुए बालू का खनन किया जाएगा।

-रोजगार सृजन सुनिश्चित कराने के लिए बंदोबस्तधारियों की संख्या में वृद्धि करना

-बालू ढोने वाले वाहनों को तारपोलीन से कवर किया जाए।

-नदी के तीन सौ मीटर की दूरी पर बालू की लोडिंग की व्यवस्था होगी

-बालू ढोने वाले वाहनों से सड़क पर पानी नहीं टपके ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।

-मशीन से खोदाई नहीं कराकर मजदूरों से खोदाई करानी होगी।

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