किस्मत नहीं, ट्रेन में इस फॉर्मूले से मिलती है Window Seat! ज्यादातर लोग नहीं जानते होंगे रेलवे का ये नियम
अगर आपके मन में भी अक्सर ट्रेन में विंडो सीट अलॉटमेंट को लेकर सवाल खड़े होते हैं, तो यह आर्टिकल आपको जरूर पढ़ना चाहिए।

किसे और क्यों अलॉट होती है ट्रेन की खिड़की वाली सीट? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। छुक-छुक करती ट्रेन, चेहरे से टकराती ठंडी हवा और खिड़की के बाहर पीछे छूटते खूबसूरत नजारे... ट्रेन के सफर का असली रोमांच तो इसी 'विंडो सीट' पर बैठकर आता है। सफर छोटा हो या बड़ा, हर यात्री की यही ख्वाहिश होती है कि उसे बस खिड़की वाली सीट मिल जाए। कई बार तो हम मान लेते हैं कि जिसे यह सीट मिल गई, समझो उसकी लॉटरी लग गई।
हालांकि, क्या विंडो सीट मिलना महज आपकी किस्मत पर निर्भर करता है या फिर इसके पीछे भारतीय रेलवे का कोई सॉलिड नियम काम करता है? अगर आप भी अक्सर ट्रेन से सफर करते हैं, तो आज इस सस्पेंस को खत्म कर लीजिए। आइए, इस आर्टिकल में आपको समझाते हैं कि आपकी मनपसंद विंडो सीट को लेकर रेलवे का नियम आखिर क्या कहता है।

(Image Source: AI-Generated)
स्लीपर-एसी में खिड़की वाली सीट पर किसका हक?
अगर आप चेयर कार से यात्रा कर रहे हैं, तब तो कोई टेंशन नहीं है। आपके टिकट पर ही साफ-साफ लिखा होता है कि आपकी सीट खिड़की वाली है या नहीं।
असली कन्फ्यूजन स्लीपर और एसी कोच में होता है, क्योंकि वहां टिकट पर विंडो सीट जैसी कोई जानकारी नहीं होती। रेलवे के नियम बताते हैं कि जिस भी यात्री को 'लोअर बर्थ' मिलती है, असल में उसी का खिड़की वाली जगह पर पूरा अधिकार होता है। हालांकि, दिन के समय लोग आपसी समझदारी से भी जगह बांट लेते हैं और मिल-जुलकर सफर का मजा लेते हैं।
रेलवे की नजर में लोअर बर्थ का असली हकदार कौन?
अब सवाल यह है कि जब लोअर बर्थ वाले को ही विंडो सीट मिलनी है, तो यह नीचे वाली सीट दी किसे जाती है? रेलवे ने सहूलियत को ध्यान में रखते हुए कुछ खास लोगों के लिए यह सीट रिजर्व की है:
- बुजुर्ग पुरुष: 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के वरिष्ठ नागरिकों को नीचे की सीट देने में सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है।
- महिलाएं: अगर किसी महिला यात्री की उम्र 45 साल या उससे ज्यादा है, तो उनके लिए भी लोअर बर्थ का कोटा तय किया गया है।
- दिव्यांग यात्री: शारीरिक रूप से कमजोर या दिव्यांग यात्रियों को भी सफर में परेशानी न हो, इसलिए उन्हें आसानी से लोअर बर्थ अलॉट की जाती है।
मिडिल बर्थ वालों के लिए टाइमिंग है सबसे जरूरी
ट्रेन में सबसे ज्यादा बहस अक्सर मिडिल और लोअर बर्थ के यात्रियों के बीच होती है। इस झगड़े को खत्म करने के लिए रेलवे ने एक पक्का टाइमटेबल बनाया है:
- सीट खोलने का समय: अगर आपकी टिकट मिडिल बर्थ की है, तो आप इसे सिर्फ रात 10 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक ही खोलकर सो सकते हैं।
- देनी होगी जानकारी: अपनी बीच वाली सीट को खोलने से ठीक पहले, आपको नीचे बैठे यात्री को कम से कम तीन बार इसकी जानकारी देनी होगी।
- सुबह 6 बजे का अलर्ट: सुबह 6 बजते ही आपको अपनी मिडिल बर्थ हर हाल में बंद करनी होगी। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं, तो लोअर बर्थ वाला यात्री टीटीई को बुलाकर आपकी शिकायत कर सकता है।
रात 10 बजे के बाद 'नो डिस्टर्बेंस'
अगर आप सोच रहे हैं कि दिन में लोअर बर्थ पर क्या होता है, तो जान लें कि दिन के वक्त इस सीट पर सिर्फ बैठकर सफर किया जा सकता है। रात के 10 बजते ही नियम बदल जाते हैं। रात 10 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक का समय सिर्फ शांति से सोने के लिए होता है। सबसे खास बात यह है कि आराम के इस समय में खुद टीटीई भी आपको टिकट चेक करने के लिए परेशान नहीं कर सकते हैं। इसलिए, जब भी आप सफर पर निकलें, तो इन नियमों को अपने दिमाग में जरूर रखें।
