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न पर्दा, न बड़ा स्टेज, न माइक... लालटेन की रोशनी में हजारों तक पहुंचती है ये रामलीला; दिलचस्प है 200 साल पुरानी परंपरा

Published: Tue, 29 Sep 2026 04:34 PM (IST)

रामनगर की 200 साल पुरानी रामलीला शारदीय नवरात्र के बजाय अनंत चतुर्दशी से शुरू होकर 31 दिनों तक चलती है।

रामनगर की अनोखी रामलीला (Image Source: AI Generated)

रामनगर की अनोखी रामलीला (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आमतौर पर रामलीला की शुरुआत शारदीय नवरात्र से होती है और यह दशहरा तक यानी कुल 10-12 दिनों तक आयोजित की जाती है। पर आज हम जिस रामलीला की बात करने वाले हैं, उसका इतिहास दो सदी पुराना है। एक ऐसी रामलीला जिसमें पूरा शहर ही रामायण का मंच बन जाता है। 

रामनगर की अनोखी रामलीला 

उत्तर प्रदेश में वाराणसी जिले के रामनगर में पिछले 200 सालों से रामलीला की परंपरा निभाई जा रही है। कहा जाता है कि इसकी शुरुआत साल 1783 में काशी के तत्कालीन नरेश उदित नारायण सिंह ने की थी। ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य भगवान श्री राम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाना था। सबसे खास बात यह कि यहां दिखाई जाने वाली रामलीला का आधार हूबहू तुलसीदास की लिखी रामचरितमानस है। 

31 दिनों तक होता है आयोजन 

रामनगर में रामलीला का आयोजन नवरात्र में नहीं, बल्कि अनंत चतुर्दशी के दिन से होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के आनुसार, इसी दिन रावण का जन्म हुआ था। इस तरह यहां की रामलीला 10 दिन की न होकर 31 दिनों तक चलती है। 

आज भी काशी नरेश पुरानी परंपरा को निभाते हुए शाही ठाठ-बाट के साथ हाथी पर सवार होकर इस रामलीला का मंचन देखने के लिए पधारते हैं। 

पूरा शहर रामायण का मंच

जहां आम नाटकों में एक स्थाई मंच होता है, वहीं इस रामलीला में पूरा शहर ही मंच बन जाता है। यहां रामायण के अलग-अलग घटनास्थलों जैसे- अयोध्या नगरी, अशोक वाटिका, जनकपुरी, पंचवटी और लंका के लिए अलग-अलग मंचों का निर्माण किया जाता है। 

ऐसे में अगर आप रामायण देखना चाहते हैं, तो इसे किसी एक जगह पर बैठकर नहीं बल्कि अलग-अलग जगहों पर देखनी होगी, क्योंकि महीने भर के लिए पूरा शहर ही स्टेज में तब्दील हो चुका है। यही खासियत देखते हुए इस रामलीला को यूनेस्को के इंटेंजिबल धरोहर में भी शामिल किया गया है। 

एलईडी लाइटों की जगह पेट्रोमैक्स 

आप इस रामलीला में माइक्रोफोन और एलईडी लाइटों जैसे मॉडर्न टूल्स का इस्तेमाल होता नहीं पाएंगे। आज भी रामलीला मंचन के लिए पुरानी परंपरा के साथ ही पुराने तौर-तरीकों को अपनाया जा रहा है। इनमें रोशनी के लिए पेट्रोमैक्स यानी लालटेन या लैंप का उपयोग किया जाता है, जो डीजल और तारपीन के तेल के मिश्रण से जलती हैं। वहीं, कलाकार मंच से दर्शकों तक आवाज पहुंचाने के लिए माइक के बजाय अपनी बुलंद आवाज का सहारा लेते हैं।   

क्या है पूरा शेड्यूल? 

यह रामलीला 25 सितंबर से शुरू हो चुकी है, जो अक्टूबर के आखिरी हफ्ते तक चलेगी। इसका आयोजन हर दिन शाम 5 बजे से रात 9 बजे तक किया जाएगा। अगर बारिश हुई तो उन दिनों को रिजर्व रख दिया जाएगा।