साइकिल जैसी रफ्तार से तय करती है 46 KM का सफर, फिर भी भारत की इस टॉय ट्रेन में बैठने के लिए बेताब रहते हैं लोग
क्या आपने कभी ऐसी ट्रेन में सफर किया है जिसकी रफ्तार महज 10 से 12 किलोमीटर प्रति घंटा हो? जी ...और पढ़ें

दुनिया की सबसे धीमी ट्रेनों में शामिल है भारत की ये ट्रेन (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सोचिए, आप एक ऐसी ट्रेन में बैठे हैं जिसकी रफ्तार साइकिल चलाने जितनी है। जी हां, 'मेट्टुपालयम-ऊटी नीलगिरि पैसेंजर' भारत की ही नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे धीमी ट्रेनों में गिनी जाती है।
यह 46 किलोमीटर की दूरी तय करने में पूरे 5 घंटे का समय लेती है। फिर भी, इसमें सफर करने के लिए लोगों को पहले से बुकिंग करानी पड़ती है। 100 साल से भी ज्यादा समय से चल रही यह ट्रेन यात्रियों को एक ऐसा तजुर्बा देती है, जिसे वो जिंदगी भर नहीं भूलते।

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नीले डिब्बों वाली मनमोहक टॉय ट्रेन
तमिलनाडु में मेट्टुपालयम से ऊटी के बीच चलने वाली इस टॉय ट्रेन में मुश्किल से 3 से 4 डिब्बे होते हैं। ये सभी डिब्बे नीले रंग के हैं और हमेशा चमकते रहते हैं। नीलगिरि के पहाड़ों से गुजरने वाली इस ट्रेन के रास्ते में आने वाले सभी स्टेशन भी नीले रंग से ही रंगे गए हैं। ऊटी और कुन्नूर घूमने आने वाले पर्यटकों के बीच इस ट्रेन का एक अलग ही क्रेज है और यह हमेशा खचाखच भरी रहती है।
रफ्तार कम होने की असली वजह
इस ट्रेन की स्पीड करीब 10 से 12 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है। इसकी सबसे बड़ी वजह है इसका मुश्किल पहाड़ी रास्ता। इतने ऊंचे और ढलान वाले रास्तों पर चढ़ने के लिए इसमें खास 'रैक एंड पिनियन सिस्टम' का इस्तेमाल किया गया है। अपने सफर के दौरान यह ट्रेन 250 से ज्यादा पुलों, 16 सुरंगों और 208 तीखे मोड़ों से होकर गुजरती है। इन्हीं मोड़ों और गहरी ढलानों की वजह से इसकी स्पीड काफी कम रखनी पड़ती है।
अंग्रेजों के समय का कमाल
इस रेलवे लाइन को बनाना उस दौर में इंजीनियरिंग की बहुत बड़ी चुनौती थी। ब्रिटिश राज में अंग्रेज मैदानी इलाकों की भीषण गर्मी से बचने के लिए ऊटी को अपना समर वेकेशन पॉइंट बनाते थे। साल 1854 में इस रेल मार्ग का विचार रखा गया था, लेकिन दुर्गम पहाड़ों की वजह से काम 1891 में जाकर शुरू हो पाया। 1899 में नीलगिरि माउंटेन रेलवे की स्थापना हुई और 1908 तक इसे पूरी तरह चालू कर दिया गया।

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सफर में मिलते हैं जन्नत जैसे नजारे
धीमी रफ्तार के बावजूद इस ट्रेन में सफर करने वाला कोई भी इंसान बोर नहीं होता। लोग इस कम स्पीड का फायदा उठाते हुए खिड़कियों से प्रकृति का जमकर लुत्फ उठाते हैं। मेट्टुपालयम से ऊटी के रास्ते में कुन्नूर, लवडेल, एडर्ली, रननीमेड और वेलिंगटन जैसे स्टेशन पड़ते हैं। रास्ते भर चाय के खूबसूरत बागान, बर्फीली वादियां और दिल मोह लेने वाले नजारे दिखाई देते हैं। यह ट्रेन दिन भर में कई फेरे लगाती है।
यूनेस्को की विश्व धरोहर
करीब 120 सालों का सफर तय कर चुकी इस ट्रेन और इसके रूट को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज का सम्मान हासिल है। भले ही आज की नई तकनीक से इसकी स्पीड बढ़ाई जा सकती है, लेकिन इसके ऐतिहासिक महत्व को बचाने के लिए इसकी पुरानी रफ्तार और तौर-तरीकों को आज भी वैसे ही सहेज कर रखा गया है।
