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9 मंजिला गोपुरम और छत पर अद्भुत चित्रकारी, तुंगभद्रा किनारे बसे इस प्राचीन मंदिर की कहानी है बेहद खास

Published: Sun, 27 Sep 2026 11:53 AM (IST)

कर्नाटक के हंपी में तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित विरुपाक्ष मंदिर एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।

कर्नाटक का भव्य विरुपाक्ष मंदिर (फोटो सौजन्य - https://mapacademy.io)

कर्नाटक का भव्य विरुपाक्ष मंदिर (फोटो सौजन्य - https://mapacademy.io)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कर्नाटक के हंपी में तुंगभद्रा नदी के तट पर बसा विरुपाक्ष मंदिर मूल रूप से स्थानीय देवी पंपा की उपासना का केंद्र है। स्थापत्य कला का यह अद्भुत नगीना यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है, जो अपनी समृद्ध धार्मिक विरासत और बेमिसाल नक्काशी के लिए जाना जाता है...  

कर्नाटक का विरुपाक्ष मंदिर 

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(फोटो सौजन्य - https://mapacademy.io)

कर्नाटक के हंपी में तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित विरुपाक्ष मंदिर इस क्षेत्र में विजयनगर स्थापत्य के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक है। इसका सबसे प्राचीन ज्ञात उल्लेख ईस्वी सातवीं–आठवीं शताब्दी का मिलता है, जब यह स्थल स्थानीय देवी पंपा की उपासना से जुड़ा हुआ था। बाद की कथाओं में पंपा को शिव के विरुपाक्ष रूप की पत्नी के रूप में प्रस्तुत किया गया और विजयनगर साम्राज्य की स्थापना से पहले, 14वीं शताब्दी में यहां उनका एक मंदिर मौजूद था।

विरुपाक्ष प्रारंभिक विजयनगर राजाओं के लिए एक महत्वपूर्ण देवता थे। इसके बाद 15वीं और 16वीं शताब्दी में संगम और तुलुव वंश के शासकों ने इस मंदिर का व्यापक पुनर्निर्माण और विस्तार कराया। यद्यपि कभी यह मंदिर पंपा की उपासना के लिए समर्पित था, आज मंदिर परिसर में उनकी उपस्थिति उत्तरी ओर स्थित एक छोटे से मंदिर तक सीमित है। 

भव्य गोपुरम और प्रांगण

मुख्य गोपुरम पूर्वाभिमुख, नौ-मंजिला संरचना है। इसकी निचली दो मंजिलें पत्थर की बनी हैं, जबकि ऊपरी भाग ईंट और गारे से निर्मित है, जिस पर उकेरी हुई  आकृतियां दिखाई देती हैं। मंदिर में कई प्रांगण हैं, जिनमें सौ-स्तंभों वाला एक मंडप भी शामिल है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है और उसके द्वार पर लगभग दो मीटर ऊंचे, चार भुजाओं वाले दो द्वारपाल स्थित हैं। गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा-पथ बना हुआ है। 

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(फोटो सौजन्य - https://mapacademy.io)

रूपांकन से भरा गर्भगृह 

पंद्रहवीं शताब्दी में संगम वंश के शासनकाल में उत्तरी गोपुरम जोड़ा गया और लगभग 1510 के आस-पास तुलुव शासक कृष्णदेवराय ने एक लंबा खुला मंडप बनवाया। यह मंडप की आकृतियों की समृद्ध उपस्थिति के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है। केंद्रीय सभामंडप के स्तंभों से लेकर कोनों के पायों तक, जहां सवारों सहित दोहरे याली रूप उकेरे गए हैं, हर जगह यह रूपांकन दिखाई देता है। 

स्तंभों से सजा परिसर

मंदिर परिसर की ओर जाने वाला पूर्वी उत्सव-पथ भी संभवतः तुलुव राजाओं द्वारा ही बनवाया गया था। स्तंभ-पंक्तियों और बीच-बीच में खड़े ऊंचे खंभों से सुसज्जित यह मार्ग एक ऐसे मंडप पर समाप्त होता है, जिसमें विजयनगर-पूर्व काल के स्तंभों का पुनः उपयोग किया गया है। 

छत पर खूबसूरत अलंकरण

विरुपाक्ष मंदिर विशेष रूप से कृष्णदेवराय द्वारा बनवाए गए मंडप की चित्रित छत के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें विभिन्न हिंदू देवताओं के जीवन से जुड़े अनेक दृश्य चित्रित किए गए हैं। इस मंडप में तीन खंड हैं, जिनमें बीच वाला खंड अन्य दो की तुलना में अधिक चौड़ा और उनसे ऊंचा उठाया गया है। छत भित्ति-चित्रों से आच्छादित है और इसे आठ असमान पट्टों में बांटा गया है, जिन्हें आगे वर्गाकार खंडों में विभाजित किया गया है। 

इन खंडों के बीच ज्यामितीय और पुष्पीय अलंकरणों की पट्टियां बनाई गई हैं। विरुपाक्ष मंदिर हंपी के स्मारक-समूह का एक हिस्सा है, जिसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। यह आज भी एक महत्वपूर्ण धार्मिक और पर्यटन स्थल बना हुआ है।