श्राद्ध के बहाने बच्चों को बताएं अपने परिवार और पूर्वजों की कहानी, संस्कारों की मिलेगी विरासत
श्राद्ध का दिन बच्चों को परिवार की परंपराओं, पूर्वजों के जीवन और संस्कारों से जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर है।

श्राद्ध के अवसर पर बच्चों को पूर्वजों के बारे में बताएं (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
शैफाली पण्ड्या, हरिद्वार। श्राद्ध के दिन हम अपने पितरों को याद करते हैं। उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। भारतीय संस्कृति में यह परंपरा बहुत पुरानी है। लेकिन श्राद्ध केवल पूजा पाठ या किसी रस्म को निभाने का दिन नहीं है। यह अपने बच्चों को परिवार, पूर्वजों और संस्कारों से जोड़ने का भी एक अच्छा अवसर है।
मॉडर्न लाइफस्टाइल में बच्चे जड़ों से हो रहे दूर
आज के समय में बच्चों की दुनिया बहुत बदल गई है। मोबाइल, इंटरनेट, पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों के बीच उन्हें अपने परिवार की पुरानी परंपराओं और पूर्वजों के बारे में जानने का अवसर कम मिलता है। ऐसे में श्राद्ध का दिन हमें बच्चों से बातचीत करने और उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ने का अवसर देता है।
युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने संस्कारों को मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी माना। उनका मानना था कि अच्छे विचार और अच्छे संस्कार ही अच्छे मनुष्य का निर्माण करते हैं। उन्होंने परिवार को संस्कार देने की पहली पाठशाला बताया। इसलिए बच्चों को संस्कार केवल किताबों या स्कूलों से नहीं, बल्कि परिवार के व्यवहार और जीवन के उदाहरणों से मिलते हैं।
श्राद्ध के अवसर पर बच्चों को पूर्वजों के बारे में बताएं
श्राद्ध के अवसर पर हम बच्चों को अपने परदादा-परदादी, नाना-नानी और दूसरे पूर्वजों के बारे में बता सकते हैं। उन्हें उनके जीवन की छोटी-छोटी बातें और अच्छी आदतें बता सकते हैं। जैसे किसी पूर्वज ने कठिन समय में परिवार को कैसे संभाला, किस तरह मेहनत की, दूसरों की मदद की या ईमानदारी से जीवन जिया। ऐसी बातें बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव डालती हैं।
बच्चों को यह भी समझाना जरूरी है कि हम अपने पितरों को केवल इसलिए याद नहीं करते कि यह हमारी परंपरा है। हम उन्हें इसलिए याद करते हैं क्योंकि आज हमारा जो कुछ भी है, या हम जो कुछ भी हैं, उसमें पिछली पीढ़ियों का भी बड़ा योगदान है। उन्होंने परिवार के लिए मेहनत की, कठिनाइयां झेलीं और आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बनाया। उनके प्रति धन्यवाद और सम्मान का भाव रखना हमारी जिम्मेदारी है।
बच्चों का पढ़ाई के साथ अच्छा इंसान बनना जरूरी
गायत्री विद्यापीठ, शांतिकुंज में भी बच्चों की शिक्षा के साथ उनके संस्कार और चरित्र निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यहां विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति, सेवा, अनुशासन, सहयोग और अच्छे व्यवहार से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। इसका उद्देश्य यही है कि बच्चे केवल पढ़ाई में आगे न बढ़ें, बल्कि अच्छे इंसान भी बनें।
इसी भावना को हम अपने घर में भी अपना सकते हैं। श्राद्ध के दिन बच्चों को पूजा या तर्पण की प्रक्रिया में उनकी उम्र के अनुसार शामिल करें। उन्हें बताएं कि हम क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं। यदि बच्चा सवाल पूछे, तो उसे डांटने के बजाय प्यार से समझाएं। जब बच्चे किसी परंपरा का अर्थ समझते हैं, तो उसे वे मन से स्वीकार करते हैं।
अच्छी परवरिश के लिए श्राद्ध को सेवा से जोड़ें
श्राद्ध को सेवा से जोड़ना भी बच्चों को बहुत कुछ सिखा सकता है। किसी जरूरतमंद को भोजन कराना, किसी बुजुर्ग की मदद करना, पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना, पौधा लगाना या किसी जरूरतमंद परिवार की सहायता करना, ये सभी ऐसे काम हैं, जिनसे बच्चों में दया, सेवा और जिम्मेदारी की भावना बढ़ती है। सबसे अच्छी बात यह है कि बच्चों को संस्कार केवल समझाए न जाएं, बल्कि उन्हें करके भी दिखाया जाए। यदि घर के बड़े अपने बुजुर्गों का सम्मान करेंगे, जरूरतमंदों की मदद करेंगे और अपनी संस्कृति को जीवन में अपनाएंगे, तो बच्चे भी स्वाभाविक रूप से वही सीखेंगे। बच्चे हमारी बातें कम और हमारा व्यवहार ज्यादा सीखते हैं।
युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का पूरा जीवन संस्कार और सेवा की प्ररणा देता है। उनका संदेश था कि व्यक्ति स्वयं बदलेगा तो परिवार बदलेगा और परिवार बदलेगा तो समाज बदलेगा। इसलिए बच्चों को अच्छी परंपराओं से जोड़ना केवल परिवार की संस्कृति बचाने का काम नहीं है, बल्कि अच्छे समाज के निर्माण की शुरुआत भी है।
श्राद्ध हमें अपने अतीत को याद करने का अवसर देता है। साथ ही यह हमें यह सोचने का मौका भी देता है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या दे रहे हैं। धन और संपत्ति से भी बड़ी विरासत अच्छे संस्कार और अच्छे विचार हैं। इसलिए श्राद्ध के दिन अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक याद करें और बच्चों को भी इस भावना से जोड़ें।
उन्हें अपने परिवार की कहानी बताएं, अच्छे संस्कार दें और सेवा का महत्व समझाएं। यही परंपरा कोbआगे बढ़ाने का सही तरीका है। जब बच्चे अपनी जड़ों को समझेंगे, तभी वे अपने भविष्य को मजबूतbआधार दे पाएंगे।
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(लेखिका- गायत्री विद्यापीठ शांतिकुंज की प्रबंधिका हैं।)
