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"मम्मा कुछ टेस्टी मंगा दो..." 10 मिनट की ऑनलाइन डिलीवरी कहीं बिगाड़ तो नहीं रही आपके बच्चे की सेहत?

Published: Sun, 27 Sep 2026 11:33 AM (IST)

घर के बने पौष्टिक खाने की खुशबू 10 मिनट के भीतर फूड डिलीवरी के वादों और आकर्षक आनलाइन आफर्स के ...और पढ़ें

10 मिनट डिलीवरी बिगाड़ रही बच्चे! (Image Source: AI-Generated)

10 मिनट डिलीवरी बिगाड़ रही बच्चे! (Image Source: AI-Generated)

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समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

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पूजा मारवाह, देहरादून। मम्मा, कुछ टेस्टी खाने को है?' शाम होते ही यह सवाल लगभग हर घर में पूछा जाता है। फ्रिज बार-बार खोलकर देखने के बाद जैसे ही मौका मिलता है, बच्चे अपनी क्रेविंग शांत करने के लिए-स्क्रीन पर बार-बार आ रहे फूड डिलिवरी एप के चटपटे नोटिफिकेशंस देखकर- कुछ न कुछ आर्डर कर लेते हैं। घर में दाल-चावल बने हैं, गर्मागर्म रोटी तैयार हो रही हैं, लेकिन फूड डिलिवरी एप से चुटकी में फ्राइड स्नैक्स या फास्टफूड हाजिर हो चुके हैं। परिणामत:, घर में तैयार हो रहे डिनर के लिए बच्चों का मन ही नहीं करता। यह बात सिर्फ फास्टफूड या सेहत से नहीं जुड़ी है। इसके पीछे छिपी है व्यावहारिक व लेन-देन से जुड़ी समझ।

वो इन्कार था एक सबक

वो दौर जब माता-पिता बच्चों को गिनी-चुनी पाकेट मनी देते थे। तब जेब में दस रुपये का नोट भी बड़ी अहमियत रखता था। पाकेट मनी खत्म, तो खत्म! अगले माह तक इंतजार ही एकमात्र रास्ता था। कोई खिलौना या कपड़ा पसंद आया, तो अगले जन्मदिन का इंतजार करना पड़ता था। बाजार जाकर दो-तीन दुकानों से सामान की कीमत की तुलना करना और फिर भी मम्मी का वो बेबाक जवाब- 'इसकी कोई जरूरत नहीं है।' उस 'नहीं' से दुख जरूर होता था, लेकिन उसी इन्कार ने बच्चों को 'जरूरत' और 'चाहत' के बीच का फर्क सिखाया। आज पैसे डिजिटल हो गए हैं। बच्चे नोटों को हाथ से खर्च होते नहीं देखते। उनके लिए तो बस स्क्रीन पर एक संख्या बदलती है। 199 रुपये का बर्गर 179 रुपये का हो गया या 799 रुपये का गैजेट महज 599 रुपये का, सब कुछ 'ओके' जैसे छोटे से बटन में सिमट गया है।

जेब की समझ पर भी चोट

आज बच्चों की शायद ऐसी पहली पीढ़ी की परवरिश हो रही है, जिसके लिए 'इच्छा' और 'पूर्ति' के बीच का फर्क खत्म सा हो गया है। भूख लगी? तुरंत खाना हाज़िर। कुछ पसंद आया? तुरंत ऐड टू कार्ट। दोस्त का नया फोन कवर देखा? तुरंत आर्डर। भुगतान? मम्मी-पापा का यूपीआइ, क्रेडिट कार्ड या डिजिटल वालेट। कई बार माता-पिता भी बिना सोचे-समझे बच्चे द्वारा भेजे गए पेमेंट के क्यूआर कोड को स्कैन करके स्वयं ही भुगतान कर देते हैं। तकनीक और सुविधाओं से कोई गुरेज नहीं है। असल समस्या सुविधा में नहीं, बल्कि बच्चों तक पहुंच रहे इस गलत संदेश में है-'अगर मेरा मन हुआ, तो चीज तुरंत मिलनी ही चाहिए।' स्क्रीन पर एक-दो क्लिक करते ही जब पसंदीदा खाना दरवाजे पर आ जाता है, तो बच्चों को लगता है कि चीजें मुफ्त या बेहद आसान हैं। उन्हें यह समझ ही नहीं आता कि इस खाने के पीछे कितनी मेहनत की कमाई लग रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है उन्हें मिल रहा पेमेंट का एक्सेस। इस तरह का क्विक फूड आर्डर माता-पिता के फोन से या बच्चे अपने ही फोन से कर लेते हैं। ऐसे में पहले से ही सुरक्षित कार्ड या यूपीआइ डीटेल यह पता ही नहीं लगने देती कि पैसा कितनी तेजी से खर्च हो गया।

दें जीवन की सीख

हमारी जिम्मेदारी बच्चों को केवल अच्छा खाना और सहूलियत देना नहीं है। उन्हें यह समझाना भी हमारा फर्ज है कि हर चाहत 'जरूरत' नहीं होती और फोन पर दिखने वाला डिजिटल पैसा भी उतना ही असली है, जितना कभी हमारी मुट्ठी में बंद वो दस रुपये का नोट हुआ करता था। तकनीक और डिलीवरी एप्स हमारी सुविधा के लिए हैं, हमारी जीवनशैली पर हावी होने के लिए नहीं। जब हम बच्चों को यह समझाएंगे कि असली स्वाद और सेहत घर की थाली में है और पैसे कड़ी मेहनत से आते हैं, तभी हम उन्हें एक सेहतमंद और जिम्मेदार भविष्य दे पाएंगे।

ऐसे करें नियंत्रित

बच्चों की इस डिजिटल जिद को डांट-डपटकर नहीं, बल्कि समझदारी से नियंत्रित करने की जरूरत है। बच्चों को पैसों की दुनिया से पूरी तरह काटकर रखना सही समाधान नहीं है। उन्हें पैसों से जोड़ना होगा, लेकिन समझदारी के साथ- हर महीने बच्चों को तय बजट दें। बाहर के खाने या आनलाइन शापिंग का खर्च हो या उनकी स्टेशनरी, सब उसी में से हो।

हर खरीदारी से पहले उनसे पूछें- क्या यह हमारी जरूरत है, चाहत है या बस अभी का मजा? बच्चों के फोन में अपने कार्ड या यूपीआइ का लागिन या जानकारी सुरक्षित न करें। बच्चों द्वारा होने वाले हर ट्रांजेक्शन के लिए आपकी अनुमति अनिवार्य हो।

और सबसे मुश्किल नियम- जो आपको अपने लिए बनाना होगा। बच्चे हमारी नसीहतों से कम और हमारी आदतों से ज्यादा सीखते हैं। अगर घर में हर दूसरे दिन कोई कूरियर पैकेट आ रहा है, छोटी-छोटी बात पर एप खुल रहे हैं और हर शाम 'डिनर में क्या बनेगा?' का हल फूड डिलीवरी है, तो बच्चों से संयम की उम्मीद करना बेमानी है।

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