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बात-बात पर भटक जाता है बच्चे का ध्यान, तो न करें डांटने की गलती; वैज्ञानिकों ने बताई इसकी वजह

Published: Sun, 27 Sep 2026 06:04 PM (IST)

अक्सर बच्चों का ध्यान भटकना उनकी शरारत नहीं, बल्कि सीखने का एक कुदरती तरीका होता है।

हर छोटी बात पर भटक जाता है बच्चे का ध्यान? (Image Source: AI-Generated)

हर छोटी बात पर भटक जाता है बच्चे का ध्यान? (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अक्सर माता-पिता इस बात से बहुत परेशान रहते हैं कि उनका बच्चा स्कूल जाते समय या घर से निकलते वक्त रास्तों की चीजों में खो जाता है, जिससे उन्हें देर हो जाती है। बच्चे का लगातार सवाल पूछना या एक जगह ध्यान न लगाना बड़ों को उसकी जिद, शरारत या 'एडीएचडी' डिसऑर्डर लग सकता है। हालांकि, अगर आप भी ऐसा ही सोचते हैं, तो ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों की नई स्टडी आपको बड़ी राहत देगी।

इस शोध के अनुसार, बच्चों का ध्यान भटकना कोई अनुशासनहीनता नहीं है, बल्कि उनके सीखने का एक बिल्कुल कुदरती तरीका है।

क्यों भटकता है बच्चों का ध्यान?

मनोवैज्ञानिक व्लादिमीर स्लौत्स्की ने अपनी रिसर्च में साफ किया है कि बच्चों का दिमाग कुदरती रूप से ऐसा ही डिजाइन किया गया है कि उनका ध्यान अलग-अलग चीजों पर जाए। 'ट्रेंड्स इन कॉग्नेटिव साइंसेज' में छपी रिपोर्ट बताती है कि 3 से लेकर 8 साल तक के बच्चे अपने आस-पास की दुनिया को बड़ों की तुलना में ज्यादा गहराई से खोजना चाहते हैं।

इसका सीधा सा वैज्ञानिक कारण उनकी 'वर्किंग मेमोरी' का पूरी तरह से विकसित न होना है। वर्किंग मेमोरी हमारे दिमाग का वह टूल है, जो हमें फालतू की चीजों को इग्नोर करके सिर्फ काम की बात पर फोकस करने में मदद करता है। हम बड़े लोग तुरंत डिसाइड कर लेते हैं कि हमें क्या देखना है और क्या नहीं। हालांकि, बच्चों के पास चीजों को छांटने की यह क्षमता उतनी तेज नहीं होती, इसलिए वे एक साथ बहुत सारी चीजों पर फोकस करने लगते हैं। विज्ञान की भाषा में इसे 'डिस्ट्रिब्यूटेड अटेंशन' कहा जाता है।

काम खत्म होने के बाद भी जारी रहती है खोज

साल 2024 में स्लौत्स्की और कियानकियान वान ने मिलकर एक और शोध किया। इसमें यह दिलचस्प बात सामने आई कि अगर कोई बच्चा किसी काम को करने के लिए जरूरी जानकारी हासिल कर भी लेता है, तब भी वह शांत नहीं बैठता। वह अपने आस-पास की बाकी चीजों और सूचनाओं को भी टटोलता रहता है। दरअसल, इसके जरिए वे इंसान बनने और दुनिया को समझने का अपना काम बखूबी कर रहे होते हैं।

जब बड़ों का दिमाग बन जाता है 5 साल के बच्चे जैसा

इस रिसर्च में बड़ों को लेकर भी एक बहुत ही हैरान करने वाली बात सामने आई। प्रयोग के दौरान जब वयस्कों की वर्किंग मेमोरी पर काम का बहुत ज्यादा बोझ डाला गया, तो उनका दिमाग भी बच्चों की तरह बर्ताव करने लगा। जब बड़ों का दिमागी फिल्टर थक जाता है या कमजोर पड़ता है, तो वे भी एक 5 साल के बच्चे की तरह अलग-अलग विकल्पों में अपना ध्यान बांटने लगते हैं।

माता-पिता क्या करें?

इस शोध के आधार पर मनोवैज्ञानिक स्लौत्स्की पेरेंट्स को एक खास सलाह देते हैं। उनका कहना है कि बच्चों को चीजों को छूने और उन्हें एक्सप्लोर करने से कभी नहीं रोकना चाहिए। अगर माहौल सुरक्षित है, तो बच्चों को चीजें खोलने दें, उन्हें आजमाने दें और उनसे गलतियां भी होने दें। खुद से प्रयोग करना और नई चीजों को हाथ लगाना ही बच्चों के सीखने का सबसे बेहतरीन तरीका है।

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