विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 09, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

मिलिए, छोटे पर्दे की बोल्ड भाभी सौम्या टंडन से

By Srishti VermaEdited By:
Published: Mon, 09 Jan 2017 03:17 PM (GMT+05:30)Updated: Mon, 09 Jan 2017 03:42 PM (GMT+05:30)

धारावाहिक ‘भाबीजी घर पर हैं की अनीता विभूति नारायण मिश्रा को शोहरत दिला रही हैं सौम्या टंडन। उनका कहना है ...और पढ़ें

मिलिए, छोटे पर्दे की बोल्ड भाभी सौम्या टंडन से
मिलिए, छोटे पर्दे की बोल्ड भाभी सौम्या टंडन से

आजकल टीवी पर महिला किरदारों का दबदबा है?
-यह विडंबना है कि भारतीय टीवी पर पुरुषों के लिए शो ही नहीं हैं। ज्यादातक कहानियां किचन पॉलिटिक्स पर आधारित होती हैं। कुछ शो माइथोलॉजिकल और ऐतिहासिक होते हैं, उसमें भी पुरुषों को ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती है। वे कॉमेडी और न्यूज को ही ज्यादा तरजीह देते हैं। घरेलू महिलायें कामकाज के साथ टीवी देख लेती हैं। यही वजह है कि महिलाओं का तादाद ज्यादा है। उन्हें ध्यान में रखकर शो बन रहे हैं। हालांकि हमारे शो के हर किरदार अहम हैं। उसमें सास बहू की साजिशें नहीं हैं। यही वजह है कि सभी उसे चाव से देखते हैं।
शो के लिए आपको बेस्ट कॉम्प्लीमेंट क्या मिला है?
-मुझे सोशल साइट्स पर ढ़ेरो लोगों की प्रतिक्रिया मिलती रहती है। उनका कहना है कि मेरी एक्टिंग नेचुरल लगती है। उससे वे कनेक्शन फील करते हैं। मुझे निजी तौर पर भी बनावटी एक्टिंग पसंद नहीं है। कलाकार की खूबी यही है कि वह किरदार के रंग में रंग जाए। कई लोग मुझे एक्सप्रेशन क्वीन भी कहते हैं। सीरीयल में अक्सर मेरे हाव भाव बहुत कुछ बयां कर देते हैं।

सौम्या, अनीता के किरदार को कैसे देखती हैं?
-धारावाहिकों में भाभी की छवि आम तौर पर सती सावित्री, असहाय या अबला महिला की रही है। अनीता भारतीय टीवी पर सबसे बोल्ड भाभी है। वह आधुनिक, आत्मनिर्भर और सशक्त महिला है। कॉमेडी की लिबर्टी लेकर उसे थोड़ा हावी दिखाया है। वह हप्पू सिंह या मनमोहन तिवारी को अपने आस पास फटकने भी नहीं देती है। वह पति की गलतियों पर पर्दा नहीं डालती हैं। उसे दंड देने का माद्दा रखती है। साथ ही उससे प्यार भी बहुत करती है। वह रोमांटिक और नटखट भी है। खुश हूं कि उसे दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा है।
ये भी पढ़ें कैसे रखें खुद को पॉजीटिव, सीखें अभिनेत्री दीपिका पादुकोण से
गांवों से महिलाओं का स्तर उठाने में टीवी कितना मददगार हो सकता है?
-उसके लिए सोच बदलनी होगी। गांव में बेटी की जन्म के बाद सोच उसकी शादी तक सीमित हो जाती है। गांव ही क्यों टीवी की भी यही सोच है। धारावाहिकों में भी युवा लड़कियों की जिंदगी शादी के इर्द गिर्द होती है। माता पिता से लेकर बेटी तक सब सादी को लेकर चिंतित रहते हैं। शो के दो से तीन महीने इसी में निकल जाते हैं। उसके बाद कहानी ससुराल के ताने बाने में आ जाती है। उसके करियर की बात उसमें गुम होती है। कई बार सोचती हूं कि ये धारावाहिक किसके लिए है। हमारे घर पर किस्मत का माहौल नहीं था बचपन से ही करियर पर फोकस करने की बात होती थी। 18 साल की उम्र से ही हम करियर की उधेड़बुन में रहते थे कि क्या करें। वे अलग किस्म की समस्यायें होती हैं। बहरहाल मेरा मानना है कि हर लड़की का शिक्षित और आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर होना बहुत ही जरुरी है। अशिक्षा की स्थिति आने पर हुनर को अपनी ताकत बनाना चाहिए ताकि आप किसी के मोहताज न रहें। मैं अपनी हेयरड्रेसर का उदाहरण देती हूं। वह गांव से ताल्लुक रखती हैं । ज्यादा शिक्षित नहीं है लेकिन हुनरमंद है। वह पार्लर चलाती है अपना घर खुद चलाती है। हालांकि इसका क विपरित पहलू भी है। वह यह कि कामकाजी महिलाओं को घर और ऑफिस की दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। बावजूद इसके महिलायें सुपरवुमन बन कर सारी जिम्मेदारी बखूबी निभा ले जाती हैं।
वर्तमान के कलाकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
-मैं अपनी बात करती हूं। टीवी जगत में काम बेशुमार है। लेकिन क्वालिटू नहीं है। यहां अच्छे कंटेंट की कमी है। मुझे सास बहू या माइथोलॉजिकल शो नहीं करना है। टीवी में स्लैंप्स्टिक कॉमेडी ज्यादा होती है। लिहाजा चुनौती काम मिलने की नहीं है। यहां काम बहुत हैं मगर अच्छे प्रोजेक्ट बमुश्किल ही मिलते हैं। फिल्मों में अब छोटे बजट और महिला केंद्रित फिल्में आ रही हैं। हालांकि उम्दा कंटेंट वाली फिल्में वहां भी सीमित हैं। दंगल इसका अपवाद है।
ये भी पढ़ें एक मुलाकात छोटे पर्दे की स्टंट वूमेन गीता टंडन से