सिर्फ डांस नहीं, एक अलग ही दुनिया का एहसास है 'यक्षगान'! विजयनगर साम्राज्य से जुड़ा है इस लोक नृत्य का इतिहास
कर्नाटक का यक्षगान एक लोक नृत्य-नाटक है, जिसका इतिहास सदियों पुराना है।

बहुत खास है कर्नाटक का यक्षगान (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कर्नाटक की संस्कृति में यक्षगान की खास जगह है। ये कर्नाटक के तटीय जिलों और केरल के कुछ हिस्सों में खासतौर से मशहूर है। ये सिर्फ एक नृत्य नहीं है। इसमें नाटकस संगीत और संवाद सबकुछ एक साथ देखने को मिलता है, जो इसे काफी मजेदार बनाता है।
ये लोक नृत्य दर्शकों को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है और ऐसा लगता है जैसे हम भी उसी कहानी का हिस्सा बन गए हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं इसकी शुरुआत कैसे हुई थी? आइए जानें यक्षगान का इतिहास क्या है और क्यों ये इतना खास है।
यक्षगान का इतिहास क्या है?
यक्षगान दो शब्दों से मिलकर बना है, यक्ष और गान। यक्ष का मतलब होता है देवता या स्वर्ग में रहने वाला और गीत को कहानी के लिए इस्तेमाल किया गया है। इस लोक नृत्य का इतिहास 11वीं से 16वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है। विजयनगर साम्राज्य के दौरान इसे शाही संरक्षण मिला और जक्कूला वारु समुदाय के लोग इसे शाही दरबारों में पेश किया करते थे।
आज के समय में दिखने वाला यक्षगान भक्ति आंदोलन से प्रभावित है। शुरुआत में इसे मंदिरों में और खुले आसमान के नीचे रातभर किया जाता था। साथ ही, शुरुआत में यक्षगान में सिर्फ पुरुष ही हिस्सा लिया करते थे, लेकिन अब महिलाएं भी शामिल होने लगी हैं।
क्या है यक्षगान की खासियत?
यक्षगान में ज्यादातर रामायण, महाभारत और पुराणों से जुड़ी कहानियों को नृत्य और नाटक के जरिए दिखाया जाता है। इसमें कलाकार सिर पर मुकुट, पारंपरिक रंग-बिरंगे कपड़े और चेहरे पर बहुत आकर्षक मेकअप करते हैं, जिससे दर्शकों को उनके चेहरे के हाव-भाव आसानी से समझ आते हैं।
इस नृत्य में एक कथाकार होता है, जो कहानी सुनाता है, जिसे भागवत कहा जाता है। इस नृत्य के दौरान किया जाने वाला संवाद मुख्य रूप से कन्नड़ या तुलु भाषाओं में होता है। इस नृत्य-नाटक में चेंडे और मद्दले जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल होता है।
कैसे किया जाता है यक्षगान?
पारंपरिक रूप से यक्षगान खुले मैदानों में रात के समय किया जाता है, जो सुबह तक चलता है। भागवत कहानी सुनाता है, जिसपर कलाकार नृत्य और नाटक करते हैं। इस दौरान कलाकार अपनी नृत्य की मुद्राओं और चेहरे के हाव-भावों से कहानी को दर्शकों तक पहुंचाते हैं।
