विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

जब पुरुष बनते हैं देवी काली, फिर ढोल-नगाड़ों की थाप पर शुरू होता है डांस ड्रामा; बेहद अनोखा है केरल का ‘मुडियेट्टू’

Published: Sun, 11 Oct 2026 03:00 PM (GMT+05:30)

केरल का 'मुडियेट्टू' एक अनोखा नृत्य-नाटक है, जो देवी काली और दानव दारिका के पौराणिक युद्ध पर आधारित है।

केरल का खास डांस ड्रामा ‘मुडियेट्टू’(Image Source: AI Generated)

केरल का खास डांस ड्रामा ‘मुडियेट्टू’(Image Source: AI Generated)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आमतौर पर हम जब भी बात नृत्य और नाटक की करते हैं, तो इन्हें कला के दो अलग रूपों में देखा जाता है। नृत्य में कलाकार संगीत की लय पर अपने कदमों की थिरकन से दर्शकों का मनोरंजन करता है, वहीं नाटक में सारा खेल अभिनय और कहानी का है। 

आपको शायद पता न हो पर केरल राज्य में इन दोनों का खूबसूरत संगम देखने को मिलता है, जिसका नाम ‘मुडियेट्टू’ है। सबसे खास बात कि यह डांस ड्रामा देवी काली पर आधारित है। 

केरल का खास डांस ड्रामा ‘मुडियेट्टू’

मुडियेट्टू केरल के मध्यवर्ती जिलों जैसे- त्रिशूर, एर्नाकुलम और कोट्टायम के मां भद्रकाली के मंदिरों में आयोजित होने वाला एक नृत्य नाटक है। बताते चलें कि केरल में धार्मिक अनुष्ठान केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, उसका एक रूप डांस ड्रामा भी है जिसके माध्यम से देवी का आह्वान किए जाने की सदियों पुरानी परंपरा है। बता दें कि यह डांस ड्रामा यूनेस्को की इनटैंजिबल कल्चरल हेरिटेज ऑफ ह्यूमैनिटी लिस्ट में शामिल है।

क्या है मुडियेट्टू का मतलब? 

मुडियेट्टू एक मलयालम भाषा का शब्द है, जिसमें 'मुडी' का मतलब मुकुट या हेडगेयर है। इस तरह यह शब्द मुकुट धारण करने के लिए कहता है। ऐसी मान्यता है कि एक बार अगर इस नृत्य नाटक में हिस्सा लेने वाला कलाकार मुकुट धारण कर ले, तो वो खुद देवी का रूप ले लेता है और पूरे प्रदर्शन के समय इसी दिव्य अवस्था में रहता है। 

कर्नाटक के भूतकोला से है मिलता-जुलता 

जान लेने वाली बात यह है केरल का मुडियेट्टू कर्नाटक के भूतकोला से बहुत हद तक मिलता-जुलता है। ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों दैवीय शक्ति के आह्वान से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान है और दोनों में ही मुकुट पहनने का खास महत्व भी है। इसके अलावा, दोनों ही नृत्य नाटक का उद्देश्य दर्शकों का मनोरंजन करना नहीं, बल्कि शक्ति को बुलावा देना है। 

देवी काली से जुड़ी पौराणिक कथा पर है आधारित 

इस नृत्य नाटक की कहानी देवी काली और दानव दारिका के बीच हुए पौराणिक युद्ध से जुड़ी हुई है। जब दानव दारिका ने भगवान ब्रह्मा से यह वरदान मांगा कि कोई भी मनुष्य, देव या दानव उसे नहीं मार सकता, तो स्वयं देवी काली ने उसका संहार किया था। इस तरह मुडियेट्टू बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। 

कैसे शुरू होता है मुडियेट्टू? 

इस नृत्य नाटक में केरल का पूरा गांव हिस्सा लेता है, गर्मी की फसल कटने के बाद एक दिन चुना जाता है और उस तय दिन पर सभी मंदिर में इकट्ठा होते हैं। कलाकार उपवास कर खुद को शुद्ध रखते हैं और फिर मंदिर के फर्श पर चावल के आटे, कोयला, हल्दी, पत्तियों के पाउडर और चूने जैसे प्राकृतिक रंगों से भद्रकाली की छवि बनाई जाती है। इस छवि को केरल में कलम कहा जाता है। 

इसके बाद ढोल-नगाड़े बजाते हुए नृत्य नाटक किये जाने की पोर गांव में घोषणा होती है। छवि के पास सबसे पहले देवी का आह्वान किया जाता है और तब जाकर मुडियेट्टू की शुरुआत होती है। 

देवी काली का चेहरा बनाने का कला

कलाकार देवी काली का चेहरा यानी मुकुट तैयार करने के लिए लकड़ी और नारियल के पट्टी की मदद ली जाती है, जिसे काला रंगा जाता है। इसके ऊपर सफेद और लाल रंग से छोटे-छोटे बिन्दु बनाए जाते हैं ताकि चेहरे के भाव को उग्र रूप में दिखाया जा सके।