तालियों की थाप गोल घेरे में महिलाएं करती हैं सुआ नृत्य; बहुत दिलचस्प है छत्तीसगढ़ के इस लोक नृत्य की कहानी
छत्तीसगढ़ पर दीवाली के आस-पास सुआ नृत्य किया जाता है। इस नृत्य को सिर्फ महिलाएं करती हैं।

छत्तीसगढ़ का मशहूर लोक नृत्य (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दीवाली पर आमतौर पर दीये जलाकर त्योहार मनाया जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में दीवाली का त्योहार सुआ नृत्य के बिना अधूरा है। ये नृत्य छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदाय से जुड़ा है और वहां की लोक संस्कृति का अहम हिस्सा है।
सुआ नृत्य में पुरुष शामिल नहीं होते। ये नृत्य सिर्फ महिलाएं करती हैं और ये इतने मजेदार गीतों पर किया जाता है कि देखने वालों के लिए नजरें हटाना मुश्किल हो जाता है। आइए जानें क्यों किया जाता है सुआ नृत्य और इसकी खासियत क्या है।
क्या है सुआ नृत्य का इतिहास?
सुआ नृत्य का इतिहास छत्तीसगढ़ की गोंड जनजाति से जुड़ा माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार ये नृत्य नई फसल की कटाई के समय किया जाता है और इसे भगवान शिव माता पार्वती विवाह से भी जोड़कर देखा जाता है। छत्तीसगढ़ में शिव-पार्वती विवाह को गौरा-गौरी विवाह कहा जाता है।
ऐसा भी माना जाता है कि पुराने समय में जब महिलाएं अपने मन की भावनाएं खुलकर नहीं कह पाती थीं, तब तोते को अपना संदेशवाहक बनाकर वो अपने संदेश अपने आराध्य तक पहुंचाती थीं। ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही और आज छत्तीसगढ़ की संस्कृति का अहम हिस्सा बन चुकी है।
कब किया जाता है सुआ नृत्य?
सुआ नृत्य मुख्य रूप से दीपावली के पर्व के आसपास किया जाता है। इसकी शुरुआत आमतौर पर शरद पूर्णिमा के आसपास हो जाती है और कई जगहों पर एक महीने तक चलता है। ये समय सिर्फ दीवाली का नहीं होता, बल्कि इस समय धान की कटाई भी होती है और नई फसल घर आती है।
इसलिए प्रकृति का आभार जताने के लिए महिलाएं एक टोकरी में नई फसल रखती हैं और लकड़ी के सुआ यानी तोते को उस पर रखकर वे गोल घेरा बनाकर नृत्य करती हैं।
कैसे किया जाता है सुआ नृत्य?
सुआ नृत्य के लिए बांस की एक टोकरी ली जाती है, जिसमें नया कटा हुआ धान भरा जाता है। उस धान के ऊपर मिट्टी या लकड़ी से बने तोते की मूर्ति रखी जाती है। इस तोते को भगवान शंकर और माता पार्वती का प्रतीक माना जाता है।
कई जगहों को पर तोते को हरे कपड़े और धान की नई बालियों से भी सजाया जाता है। इसके बाद महिाएं इस टोकरी को घर के आंगन के बीच में रखती हैं और इसके चारों ओर गोल घेरा बनाकर खड़ी होती हैं और नृत्य करती हैं।
इस नृत्य के दौरान महिालएं तोते की तरह अपनी गर्दन मटकाती हैं और पैरों को आगे-पीछे करते हुए नृत्य करती हैं। इस दौरान उनके तोते की तरह झुकने और घूमने का अंदाज काफी खूबसूरत लगता है। इस नृत्य की खासियत है कि इसके लिए किसी भी वाद्य यंत्र का इस्तेमाल नहीं किया जाता। महिलाएं केवल तालियों की थाप पर सुआ गीत गाती हैं और नृत्य करती हैं।
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