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देवभूमि में ‘जागर’ गीत सुनते ही क्यों झूमने लगता है डंगरिया? पहाड़ों के ईष्ट देवता है इस खास परंपरा का नाता

Published: Sat, 17 Oct 2026 08:00 PM (IST)

उत्तराखंड की लोकपरंपरा जागरन में ढोल-दमाऊं और हुड़का की थाप पर देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है।

जागर उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक (Image Source: AI Generated)

जागर उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। देवभूमि उत्तराखंड की आब-ओ-हवा में हर बार एक अलग अनुभव का एहसास होता है। इसकी वजह सिर्फ यहां की प्रकृति नहीं है; बल्कि वो लोकपरंपराएं भी हैं जिन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजा जा रहा है। ऐसी ही एक खास परंपरा और लोकगीत दोनों है जागर, जिसमें ढोल-दमाऊं और हुड़का की थाप सुनने को मिलती है। आज हम उत्तराखंड की इसी खास संस्कृति के बारे में बात करने वाले हैं। 

क्या है जागर के लोकगीत और परंपरा? 

जागर उत्तराखंड के साथ ही नेपाल का भी रात में किया जाने वाला एक अनुष्ठान और लोकगीत से जुड़ा एक खास रिवाज है। इसमें ‘जागर’ शब्द हिन्दी के जागरण शब्द से लिया गया है, जिसका मतलब जगाना या सचेत करना है। इस परंपरा में गीत गाकर और वाद्य यंत्रों की तेज थाप से स्थानीय लोक देवी-देवताओं और अपने पूर्वजों की आत्माओं का आह्वान किया जाता है, यानी उन्हें जगाया जाता है। 

क्यों किया जाता है देवी-देवताओं का आह्वान? 

अब सवाल यह कि क्यों पहाड़ों में देवी-देवताओं और पूर्वजों को इस तरह जगाते हैं? तो बता दें कि यह पहाड़ी लोगों का अपने ईश्वर से न्याय मांगने का एक तरीका है। हर क्षेत्र और गांव के अपने ईष्ट होते हैं, जो उनकी विपत्तियों से रक्षा करते हैं। ऐसे में स्थानीय लोग किसी भी मुश्किल घड़ी में जैसे- लंबी बीमारी, मानसिक या शारीरिक परेशानी या किसी अनहोनी से अपनी रक्षा के लिए अपने ईष्ट देवी-देवता से न्याय की गुहार लगाते हैं। 

ढोल-दमाऊं और हुड़का की है खास भूमिका 

देवभूमि के लोकवाद्य यंत्र ढोल-दमाऊं और हुड़का ‘जागर’ परंपरा की जान हैं। कहते हैं कि इन इंस्ट्रूमेंट्स के बिना गढ़-कुमाऊं के सभी रस्मों-रिवाज ही अधूरे हैं। ऐसी मान्यता है कि एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को डमरू सुना रहे थे, इसकी थाप किसी गण ने सुन ली और ऐसे ढोल की शुरुआत हुई। 

यही वजह है कि ढोल-दमाऊ को उत्तराखंड में देव वाद्य का दर्जा मिला हुआ है। इसमें ढोल माता पार्वती की ऊर्जा और दमाऊ भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है। 

जगरिया गाता है, डंगरिया नृत्य करता है 

पहले पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है, फिर ढोल-दमाऊ की थाप पर देवी-देवताओं से जुड़े लोकगीत जगरिया शुरू करता है। इन गीतों को सुनकर डंगरिया के शरीर में कंपन शुरू होने लगती है, वह जब भक्ति भाव में पूरा डूब जाता है तो नृत्य की शुरुआत होती है। ऐसी मान्यता है कि पहाड़ों में डंगरिया केवल नृत्य नहीं करता, यह वो पवित्र व्यक्ति है जिसके भीतर उस समय देवी-देवता या आत्मा प्रवेश करती है। 

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