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पंजाबी लोकगीतों की आन-बान-शान है ‘टप्पा’; ‘चिट्टा कुक्कड़’ से ‘बारी बरसी’ तक आज भी गूंजता है इसका जादू 

Published: Sat, 17 Oct 2026 05:22 PM (IST)

पंजाब की 'टप्पा' गायकी शैली एक अनोखी सेमी-क्लासिकल शैली है, जिसे ऊंट चालकों ने शुरू किया था।

पंजाब की टप्पा शैली पर आधारित हैं यहां के ज्यादातर लोकगीत (Image Source: AI Generated)

पंजाब की टप्पा शैली पर आधारित हैं यहां के ज्यादातर लोकगीत (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। ‘चिट्टा कुक्कड़ बनेरे ते’ से लेकर ‘काला शाह काला’ तक, ऐसे बहुत से पंजाबी गाने हैं जो आज भी हम सभी का मनोरंजन कर रहे हैं। हम बिना सोचे-समझे इनपर थिरकना शुरू कर देते हैं, क्योंकि इनकी धुन ही ऐसी है। पर कभी सोचा है कि पंजाब के गाने आखिर इतने अलग और खास क्यों होते हैं? क्यों इनमें एक क्लासिकल म्यूजिक से थोड़ा हटकर फील आता है? 

इसकी वजह है यहां की अनोखी गायकी, जिसे हम टप्पा कहते हैं। आज हम आपको पंजाब की इसी मशहूर लोकगायकी शैली के बारे में बताने जा रहे हैं। 

क्या है पंजाब की टप्पा शैली? 

टप्पा एक हिन्दुस्तानी सेमी क्लासिकल गायकी शैली है, जो अपनी तेज गति और ऊर्जावान अंदाज के लिए जानी जाती है। यह नाम टप्पा ‘टप्पना’ शब्द से निकला है, इसका मतलब होता है कूदना या टापना। इस नाम के पीछे वजह यही है कि इस गायन शैली में गीत के बोल ध्रुपद या खयाल जैसी शास्त्रीय शैलियों से हटकर छोटे और तानों जैसे होते हैं। इसे गायकी की भाषा में मुरकी, खटका या जमजमा कहा जाता है। 

पंजाब के ऊंट चालकों से हुई टप्पा लोकगीतों की शुरुआत 

कहते हैं कि पंजाब और सिंध प्रांत के ऊंट चालकों ने टप्पा शैली में लोकगीतों को गाने की शुरुआत की थी। उस समय ऊंट चालक ऊंट की चाल और धचकों के साथ लय मिलाते हुए गीत गाते थे, जिसे आगे चलकर टप्पा नाम दिया गया। इसके बाद 18वीं सदी के मध्य में अवध के नवाब आसफुद्दौला के दरबारी गायक गुलाम नबी शोरी ने टप्पा की पहचान कर इसे क्लासिकल म्यूजिक में जोड़ दिया। 

कहा जाता है कि उस दौर में टप्पे बाईजी उर्फ गायिका राजा के मनोरंजन के लिए दरबार में गाया करती थीं। जबकि बंगाली टप्पा की शुरुआत का श्रेय निधु बाबू को जाता है, इस तरह संगीत में आज टप्पा के दो प्रकार हैं: एक पंजाबी टप्पा और बंगाली टप्पा। 

टप्पा शैली में गाए गए हैं मशहूर पंजाबी गीत 

हम जिन पंजाबी लोकगीतों को दशकों से सुनते आ रहे हैं, उन्हें भी इसी सेमी क्लासिकल टप्पा शैली में ही गाया गया है। इसमें 'बारी बरसी खट्टण गया सी', 'लट्ठे दी चादर', 'बल्ले-बल्ले नी टौर पंजाबी दी', 'कोठे ते आ माहिया', 'चिट्टा कुक्कड़ बनेरे ते' जैसे बहुत से मशहूर पंजाबी लोकगीत शामिल हैं।