‘यह आकाशवाणी है...’ इस पहचान के पीछे हैं रवींद्रनाथ टैगोर, भारत के पहले रेडियो को ऐसे मिला था ये नाम
ऑल इंडिया रेडियो से आकाशवाणी बनने तक, रेडियो के नाम की कहानी बहुत कम लोग जानते हैं।

आकाशवाणी नाम के पीछे की कहानी (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। ‘यह आकाशवाणी है......’ यह लाइन हमारे पारंपरिक रेडियो की खास पहचान है। आज भले ही रेडियो की जगह टीवी और डिजिटल मीडिया की खबरों, पॉडकास्ट और म्यूजिक एप ने ले ली हो, पर एक समय था जब लोग समाचार सुनने के लिए इसी पर निर्भर रहा करते थे।
पर इसके इतिहास से इतर कभी आपने सोचा है कि आखिर रेडियो का नाम पहले ऑल इंडिया रेडियो और फिर आकाशवाणी कैसे रखा गया? चलिए आज आपको आकाशवाणी नाम के पीछे की दिलचस्प वजह के बारे में बताते हैं।
भारत में पहली बार रेडियो की शुरुआत
भारत में वैसे तो अनौपचारिक रूप से रेडियो की शुरुआत जून 1923 में बॉम्बे रेडियो क्लब से मानी जाती है, लेकिन ऑफिशियल तौर पर रेडियो 23 जुलाई 1927 को शुरू हुआ। उस समय यह ऑल इंडिया रेडियो या आकाशवाणी के नाम से नहीं, बल्कि भारतीय प्रसारण सेवा के नाम से जाना जाता था। यह स्टेशन भी पहली बार बॉम्बे में ही शुरू हुआ था।
कैसे पड़ा ऑल इंडिया रेडियो नाम?
लियोनेल फील्डन को भारत का पहला ब्रॉडकास्टिंग कंट्रोलर बनाया गया था। एक बार वो वायसराय लिनलिथगो के साथ दावत में थे, तब उन्होंने वायसराय से कहा कि रेडियो का भारतीय प्रसारण सेवा नाम बड़ा ही नौकरशाही जैसा और काफी लंबा लग रहा है।
वायसराय को भी नाम के पीछे का यह लॉजिक सही लगा, पहले तो इसका नाम इंपीरियल रेडियो ऑफ इंडिया रखने का सुझाव दिया गया लेकिन फिर फील्डन ने धीरे से कहा ‘ऑल इंडिया रेडियो’। वायसराय ने भी इस नाम पर अपनी सहमति जताई और इस तरह AIR नाम साल 1935 में अस्तित्व में आया।
आकाशवाणी नाम के पीछे की कहानी
अब बात करते हैं रेडियो ने AIR से आकाशवाणी नाम तक का सफर कैसे तय किया। आकाश या स्वर्ग से आने वाली आवाज से जुड़े आकाशवाणी शब्द का प्रयोग सबसे पहले रवींद्रनाथ टैगोर ने किया था। दरअसल, साल 1938 में टैगोर कोलकाता में ऑल इंडिया रेडियो के नए शॉर्टवेव ट्रांसमीटर के उद्घाटन के लिए पहुंचे। यहां उन्होंने अपनी कविता में इस शब्द का इस्तेमाल किया था। कहते हैं इसी नाम से प्रेरणा लेकर 1956 में आधिकारिक तौर पर आकाशवाणी नाम रख दिया गया।
कहा तो यह भी जाता है कि इससे पहले ही 1935 में मैसूर में भारत का पहला निजी रेडियो स्टेशन शुरू हुआ। उस समय मैसूर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के प्रोफेसर एम. वी. गोपालस्वामी ने इस स्टेशन को आकाशवाणी नाम दिया था।
