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झारखंड की धड़कन है ‘मांदर’ की थाप, जिसकी धुन सुनते ही थिरक उठते हैं कदम; खास है इस लोकवाद्य की कहानी

Published: Fri, 02 Oct 2026 02:32 PM (IST)

झारखंड का पारंपरिक ताल वाद्य यंत्र 'मांदर' राज्य की सांस्कृतिक पहचान है, जिसकी थाप के बिना तीज-त्योहार अधूरे हैं।

झारखंड की धड़कन है मांदर वाद्य यंत्र (Image Source: AI Generated)

झारखंड की धड़कन है मांदर वाद्य यंत्र (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। झारखंड एक ऐसा राज्य है जिसकी संस्कृति, भाषा और इतिहास बिहार से बहुत हद तक मिलता-जुलता है, पर जनजातीय परंपराओं के मामले में यह बहुत अलग है। यहां के आदिवासी समुदायों के बीच लोकगीतों और नृत्यों का खास महत्व है, फिर इसमें अगर मांदर की थाप न हो तो शादी हो या त्योहार अधूरे ही माने जाते हैं। 

चलिए आज झारखंड की सांस्कृतिक पहचान कहे जाने वाले इसी मांदर के बारे में विस्तार से बात करते हैं। 

क्या है ‘मांदर’?  

मांदर झारखंड का पारंपरिक ताल वाद्य यंत्र है, जिसकी थाप से यहां के तीज-त्योहारों की रौनक बढ़ती है। इसके बनने की प्रक्रिया ही इसे बेहद खास बनाती है, क्योंकि पारंपरिक मांदर को बनाने के लिए खोखला ढांचा मिट्टी से तैयार किया जाता है। फिर दोनों सिरों पर चमड़ा मढ़ देने के बाद चमड़े की ही पट्टियों से ही उसे कसा भी जाता है। 

कंधों पर लटाकर बजाते हैं 

इस वाद्य यंत्र के दोनों मुख का आकार और उनसे निकलने वाली ध्वनि अलग होती है। वहीं, मांदर वाद्य यंत्र को बजाने के लिए कंधे पर लटकाया जाता है। फिर जब इससे धुन निकलती है, तो उसकी लयबद्धता और गूंज वाकई में सुनने लायक होती है। 

झारखंड की धड़कन है यह वाद्य यंत्र

राज्य में सरहुल, करम, अन्य तीज-त्योहार, अखड़ा हों या लोकनृत्य; मांदर के बगैर इनमें जोश ही नहीं आता। झारखंड में निवास करने वाली प्रमुख जनजातियों संथाल, उरांव, मुंडा, हो और खड़िया में इस वाद्य यंत्र को बजाए जाने का खास महत्व है। 

जरजट्टा गांव में पीढ़ियों से जिंदा है कला 

झारखंड में गुमला जिले के रायडीह प्रखंड का जरजट्टा गांव सदियों से मांदर बनाने की कला को सहेजे हुए है। इसके अलावा, लोहरदगा के सेन्हा प्रखंड में भी इस वाद्य यंत्र को पीढ़ियों से बनाया जा रहा है। वहीं, खूंटी और सिमडेगा भी उन जगहों में शामिल है, जहां मांदर जीवन के साथ ही लोकसंस्कृति का अहम हिस्सा है। 

GI टैग से मिली खास पहचान 

हाल ही में इस वाद्य यंत्र को ‘मांदर ऑफ झारखंड’ के नाम से GI टैग दिया गया है। इसमें राज्य के 43 पारंपरिक वाद्यों में मांदर को ही सबसे ऊपर रखा गया है। इस तरह अब सोहराय खोवर चित्रकला, केसरिया कलाकंद, कुचाई सिल्क, भगैया साड़ी और डोकरा क्राफ्ट को वैश्विक पहचान मिलने के बाद 'मांदर' की थाप दुनिया में गूंजेगी।