विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

भारत नहीं, अफ्रीका में पहली बार गूंजा था ‘वैष्णव जन तो...’, 500 साल पुरानी है गांधीजी से जुड़े इस भजन की कहानी

Published: Fri, 02 Oct 2026 11:30 AM (IST)

वैष्णव जन तो... भजन का इतिहास 500 साल पुराना है, जिसे 15वीं शताब्दी में संत कवि नरसिंह मेहता ने लिखा था।

महात्मा गांधी से 500 साल पहले से गुजरात में गाया जा रहा था भजन (Image Source: AI Generated)

महात्मा गांधी से 500 साल पहले से गुजरात में गाया जा रहा था भजन (Image Source: AI Generated)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। वैष्णव जन तो…” यह पंक्तियां सुनते ही हमें ईश्वर से पहले महात्मा गांधी का स्मरण हो आता है, क्योंकि यह भजन उनका पसंदीदा था। पर कभी आपने सोचा है कि गुजरात की धरती से निकला यह भजन गांधी जी को इतना प्रिय कैसे बन गया? और कैसे यह भजन सिर्फ राज्य तक सीमित न होकर पूरे देश की पहचान बन गया? आइए आपको इसकी दिलचस्प कहानी बताते हैं। 

वैष्णव जन तो…” किसने लिखा था? 

इस भजन के इतिहास को जानने से पहले हमें यह जान लेना जरूरी है कि इस लोकप्रिय भजन के रचियता कौन हैं। बता दें कि इस भजन को 15 वीं शताब्दी में में गुजराती संत कवि नरसिंह मेहता ने लिखा था। उन्होंने इसे सौराष्ट्र की 'दायरो' नामक लोक परंपरा में गाया था। 

अब बात करते हैं कि 'दायरो' की, जो गुजरात की एक ऐसी समृद्ध परंपरा है जिसमें मनोरंजन के साथ-साथ संगीत, कहानी कहने की कला, जीवन, अध्यात्म और दर्शन जैसे विषयों पर चर्चा के लिए सामुदायिक आयोजन होते थे। इस भजन की एक और खास बात थी कि इसे बेहद ही सादगी से एकतारे और मंजीरे जैसे हल्के-फुल्के वाद्य यंत्रों के साथ गाया जाता था।

महात्मा गांधी से 500 साल पहले से गुजरात में गाया जा रहा था भजन  

इस भजन को भले ही भारत की आजादी की लड़ाई से जोड़कर देखा जाता हो, पर इसका इतिहास उससे भी करीब 500 साल पुराना है। कहा जाता है कि गांधी जी का इस भजन से पहली बार सामना किसी लोक गायक के जरिए ही हुआ होगा। उनकी मां भी वैष्णव थीं, ऐसे में हो सकता है कि उन्होंने ही गांधी जी को इस भजन को गाकर सुनाया हो। 

गांधीजी को इतना प्रिय क्यों था यह भजन?

लक्ष्मी सुब्रमण्यम की पुस्तक 'सिंगिंग गांधीज इंडिया: म्यूजिक एंड सोनिक नेशनलिज्म' की माने तो गांधी जी की नजर में संगीत एक ऐसी कला थी, जिसका अपना एक उद्देश्य होना चाहिए। वो इंद्रियों को उत्तेजित करने वाले संगीत के सख्त खिलाफ थे, उनका मानना था कि संगीत का काम मन और आत्मा के उत्थान के साथ ही लोगों को समूह में बांधना होना चाहिए। 

ऐसे में वैष्णव जन तो…” भजन एकदम सरल और सहज था, जिसे गाने में न तो कठिनाई होती थी, न ही भारी भरकम वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल होता था, न ही किसी कर्मकांड की जरूरत ही पड़ती थी। 

पहली बार दक्षिण अफ्रीका में गाया 

गांधी जी से जुड़े ऐतिहासिक शोधों और दस्तावेजों के अनुसार, उन्होंने यह भजन पहली बार साल 1907 में दक्षिण अफ्रीका में गाया था। कहा जाता है कि गांधी जी ने वहां फिनिक्स सेटलमेंट और टॉल्स्टॉय नामक फार्म के लोगों को इस भजन के बारे में बताया था। 

वहीं, भारत में पहली बार इस भजन की गूंज दांडी मार्च के दौरान साल 1930 में सुनने को मिली, जब गांधीजी ने 250 मील की दांडी यात्रा शुरू की और नारायण खरे इस यात्रा के समय 'वैष्णव जन तो' गा रहे थे। इस भजन के अलावा 'रामधुन' भी गांधी जी सबसे पसंदीदा था।