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'सोनेलो गरबो शीरे...': इस गुजराती गीत को सुनकर थिरक जाते हैं सभी के कदम, मां अंबे के रास की कहता है कहानी

Published: Wed, 07 Oct 2026 02:28 PM (GMT+05:30)

गरबा के गीतों में सोनेलो गरबो शीरे काफी मशहूर है। ये गीत मां अंबे के रास और गरबे को बहुत खूबसूरती से बयां करता है।

गरबा का सुपरहिट गीत है सोनेलो गरबो शीरे (AI Generated Image)

गरबा का सुपरहिट गीत है सोनेलो गरबो शीरे (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। नवरात्र का त्योहार गुजरात की संस्कृति का अहम हिस्सा है। नवरात्र के नौ दिनों में गरबा खेलते हुए मां अंबे की आराधना की जाती है। गुजरात में गरबा के बिना नवरात्र अधूरा माना जाता है। इसलिए रात को मिट्टी के मटके में दीया जलाकर चारों ओर गोल घेरे में लोग गरबा करते हैं। 

गरबा करते समय गाए जाने वाले गीतों को गरबा गीत कहा जाता है। इन गीतों में मां अंबे की महिमा को बयां किया जाता है और ये इतने मजेदार होते हैं कि इन्हें सुनकर हर किसी के पांव थिरकने लगते हैं। इन्हीं गरबा गीतों में सोनेलो गरबो शीरे… भी शामिल है। ये गीत काफी मजेदार है। आइए जानें क्या कहता है ये गीत।    

क्या है इस गरबा गीत का भाव?

गीत की शुरुआत में कहा जाता है सोनेलो गरबो शीरे अंबे मां, चालो धीरे धीरे…यानी भक्त मां अंबे से प्रार्थना करते हैं कि वो धीरे-धीरे चलें, क्योंकि सोने का गरबा सिर पर रखा है। ये सोने का गरबा नवरात्र में काफी महत्व रखता है और मां के रूप को निहारने के लिए भक्त मां से धीरे-धीरे चलने की विनती करते हैं। 

अंबे मां खेलती हैं गरबा

इस गीत में आगे मां के गरबा खेलते समय के दृश्य का जिक्र किया गया है। माता जी जब दक्षिणी तट पर गरबा रास खेलती हैं, तो ये नजारा अद्भुत लगता है। मां अंबे अपनी सखियों के साथ घूमते हुए फूदड़ी खेल रही हैं। फूदड़ी गोल-गोल घूमकर किया जाने वाला गरबा का एक स्टेप है। इसी को इस गीत में बताया गया है। 

मां अंबे का खूबसूरत रूप

इस गीत में आगे मां अंबे के शृंगार का वर्णन किया गया है। मां की लाल चुनरी चमक रही है। उनकी प्यारी मुस्कान और गले में हीरों का हार उनकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे हैं। मां को नृत्य के साथ झांझ, पखवाज और मंजीरे की धुन उठ रही है, जो गरबा रास के माहौल को और भक्तिमय बना रहे हैं।  

देवी का गरबा गीत

गरबा मां अंबे की आराधना के लिए ही किया जाता है और उन्हीं का स्वरूप मानकर बीच में एक मटका रखा जाता है, जिसमें दीया जलाया जाता है। इस मटके को ही गरबा कहते हैं। ये गीत उसी गरबे और मां अंबे के गरबा खेलने को बयां करते हुए बनाया गया है। इस गीत की धुन गरबा की ताल से मेल खाती है, जिससे इस गीत का मजा और दोगुना हो जाता है।