रील की दुनिया में रियल जिंदगी का सबक देते हैं श्रीराम, युवाओं को सफलता के लिए जरूर सीखनी चाहिए ये शक्तियां
विजयदशमी का पर्व सत्य, धैर्य और पराक्रम से बुराई पर विजय का प्रतीक है, जो युवाओं को श्रीराम से प्रेरणा लेने को कहता है।

भगवान श्री राम के जीवन से युवाओं को जरूर सीखनी चाहिए ये बातें (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क नई दिल्ली, नई दिल्ली। विजयदशमी का पर्व हमारी सभ्यतागत चेतना का प्रतीक है। यह हमें बताता है कि सत्य, धैर्य और पराक्रम के सा किया गया संघर्ष अंततः विजय में ही परिणित होता है। श्रीरामचरितमानस में प्रभु श्रीराम के गुणों का वर्णन करते हुए लंका कांड में कहा गया हैः
'सौरज धीरज तेहि रथ चाका
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।'
यानी शौर्य और धैर्य उनके रथ के पहिए हैं। सत्य और शील उनकी मजबूत ध्वजा पताका है। आज के दौर में सूचना का विस्फोट हो रहा है। रील और रियल में फर्क करना मुश्किल हो गया है। जीवन में भौतिक साधनों की, सुविधाओं की भरमार है लेकिन शांत और प्रसन्न जीवन जीना एक चुनौती बनता जा रहा है।
ऐसे में विजयदशमी का पर्व हमें सुखी, सफल और सार्थक जीवन जीने की प्रेरक शक्ति प्रदान करता है। यह पर्व हमें बताता है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली, कितनी भी ज्ञानी, कितनी भी साधन-संपन्न क्यों न हो, यदि वह अधर्म के मार्ग पर है तो उसका अंत निश्चित है।
समझौता नहीं बुराई से
रावण एक असाधारण विद्वान था। उसके पास अपार धन संपदा और असीम शक्ति थी। पर उसकी बुद्धि अनाचार में लग गई और शक्ति अहंकार से जुड़ गई। आज हम सबके लिए विशेषकर युवाओं के लिए, यह चुनौती है कि जीवन में कई बार हमारा सामना ऐसे रावण से होता है।
कभी भ्रष्ट व्यवस्था के रूप में, कभी नशे की लत के रूप में, कभी चरित्र को दूषित करने वाले प्रलोभनों के रूप में, कभी फेक और डीप फेक समाचारों के रूप में, कभी नैरेटिव के मायाजाल के रूप में, न्यूज और इंटरनेट मीडिया की अफवाहों के रूप में; असत्य, अहंकार और अनाचार के रावण हमारे सामने आते हैं। वे हमारे मन में कुंठा, ईर्ष्या और भय की सृष्टि करते हैं। विजयदशमी से हमें प्रेरणा मिलती है कि किसी भी बुराई से हमें समझौता नहीं करना है। उसके सामने सिर नहीं झुकाना है। अपनी क्षमता और अपने संसाधनों से उसका मुकाबला करना है।
प्रकृति देती है संघर्ष की शक्ति
कई बार मन में विचार आ सकता है कि 'मैं अकेला क्या कर सकता हूं?' या फिर 'मेरे अकेले के कुछ करने से क्या होगा?' उस समय हमें प्रभु श्रीराम का जीवन और उनका संघर्ष प्रेरणा देता है। श्रीराम भी तो अकेले ही थे, साधन हीन वनवासी थे, लेकिन उन्होंने जब संघर्ष का बीड़ा उठाया तो उनके साथ प्रकृति की पूरी शक्ति आ गई। यदि आप सही हैं; आपका संघर्ष सही है तो आपको संघर्ष करने की शक्ति ये प्रकृति देती है। आज हमारे युवाओं को इसी बात की आश्वस्ति चाहिए। अन्याय करना तो अधर्म है ही, अन्याय को देखकर चुप रह जाना भी अधर्म है।
बड़े लक्ष्यों के लिए कड़ी तपस्या
प्रभु श्रीराम का चरित्र युवाओं के लिए सबसे बड़ी पाठशाला है। आज की पीढ़ी को सब चीजें तुरंत चाहिए। यह पीढ़ी इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन मानसिकता की होती जा रही है। इसमें बहुत दोष उन माता-पिता का भी है, जो सारी चीजें अपने बच्चों के सामने तुरंत रख देने को ही सही पालकत्व समझते हैं। जैसे रील 15 सेकंड में खत्म होनी चाहिए, वैसे ही सफलता भी एक रात में मिलनी चाहिए। मगर जिंदगी इस तरह नहीं चलती।
श्रीराम को राजगद्दी मिलने वाली थी, उसी रात उन्हें वनवास मिला। उन्होंने कोई विद्रोह नहीं किया। पिता की आज्ञा का पालन किया। 14 वर्ष का कठोर वनवास अनुशासन, व्रत और मर्यादा के साथ किया। यह हमारे लिए और हमारे युवाओं के लिए संदेश है कि जीवन में कोई शार्टकट नहीं होता। जो युवा जिम में दो दिन जाकर मांसपेशियां फुलाना चाहता है, जो दो महीने में स्टार्टअप से करोड़पति बनना चाहता है, उसे श्रीराम का धैर्य सीखना होगा।
लक्ष्य बड़ा है तो तपस्या भी बड़ी होगी। दृढ़ संकल्प और अनुशासन के बिना प्रतिभा और विद्वता भी व्यर्थ है। रावण विद्वान था पर अहंकारी था। श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम इसलिए कहलाए क्योंकि उन्होंने अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखा।
अकेले नहीं मिलती बड़ी विजय
श्रीराम अकेले रावण को नहीं मार सकते थे। उन्हें वनवासियों का साथ मिला, हनुमान जैसे भक्तों, वानर सेना का साथ मिला, नल-नील जैसे शिल्पज्ञों का साथ मिला, जामवंत, सुग्रीव का साथ मिला। उन्होंने अपनी एक ऐसी टीम बनाई जिसमें हर किसी की अपनी विशेषता थी, अपना कौशल था।
आज के युवा के लिए यह बहुत बड़ी सीख है। हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहां परिवारों में संवाद कम हो रहा है। एआइ ने हमें वर्चुअल दोस्त दे दिए, पर रियल दोस्त कम हो गए हैं। विजयदशमी का पर्व हमें सिखाता है कि बड़ी विजय अकेले नहीं मिलती। हमें लोगों को साथ जोड़ना आना चाहिए। सबकी प्रतिभा को पहचानना आना चाहिए। जाति, भाषा, क्षेत्र का भेद भूलकर एक लक्ष्य के लिए जुड़ना ही श्रीराम सेना का संदेश था।
ज्ञान के साथ कौशल भी आवश्यक
विजयदशमी के दिन शस्त्र पूजा की जाती है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि भारत को शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण होना चाहिए। युवाओं को समझना होगा कि केवल उपाधि अर्जित करने से काम नहीं चलेगा। आपको कौशल के क्षेत्र में भी महारत हासिल करनी होगी। अपने कौशल को निखारना और उसका परिष्कार करना आज के समय की आवश्यकता है। शस्त्र पूजा का मतितार्थ भी यही है।
रावण दहन का वास्तविक मर्म
विजयदशमी का पर्व हमें इस बात की भी सीख देता है कि हमें हमारे अहंकार को त्यागना होगा। रावण के 10 सिर- काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या आदि के प्रतीक माने जाते हैं। विजयदशमी पर रावण दहन का अर्थ है- अपने भीतर के इन 10 विकारों का शमन करें और शीलवान बनें। आज के हमारे युवा साथी लाइक्स और फालोअर्स के जाल में उलझ कर अहंकार और आत्ममुग्धता के शिकार हो रहे हैं। विजयदशमी का पर्व हमें ज्ञान के साथ विनम्रता की भी सीख देता है।
विजयदशमी पर्व है बुराई के विरुद्ध संघर्ष करने के संकल्प का, विजयदशमी पर्व है अपने संकल्प को पूरा करने के अनुशासन और समर्पण का व्रत लेने का और विजयदशमी पर्व है अपनी विजय को विनम्रता और सज्जनता के साथ स्वीकार करने का। आज हमें ऐसे ही युवाओं का निर्माण इस देश के कल्याण के लिए करना है, विजयदशमी के अवसर पर यही संकल्प लेना देश के लिए कल्याणकारी है!
युवाओं को है तीन शक्तियों की आवश्यकता
शारीरिक शक्ति
आज हमारे युवा का ज्यादातर समय मोबाइल या लैपटाप पर बीत रहा है। घंटों स्क्रीन के सामने बैठने वाली पीढ़ी के लिए आवश्यक है कि अपनी शारीरिक शक्ति का भी विकास करे। हमें अपने शरीर को इतना सक्षम बनाना है कि वह हमारे लक्ष्य का भार सहन करने के लिए सक्षम बने।
बौद्धिक शक्ति
आज फेक न्यूज, डीपफेक, प्रोपेगेंडा, फाल्स नैरेटिव, जैसे कई मायावी दानव, आपार धन संपदा और सुविधाओं के प्रलोभनों के साथ युवाओं को बरगलाने में लगे हैं। जेन जी और जेन अल्फा के नाम पर परिवारों को बांटने की और संस्कारों को खंडित करने की कोशिश की जा रही है।
हमें अपने विवेक से इनका मुकाबला करना होगा। प्रभु श्री राम ने विपरीत परिस्थिति में विवेक से ही निर्णय लिए। सूचनाएं अनंत है, और प्रलोभन अपार हैं, उनमें से सत्य को पहचानना और आवश्यकतानुसार प्रयोग करना ही बौद्धिक शक्ति का विकास है।
मानसिक शक्ति
आज अवसाद, चिंता, अकेलापन युवाओं की बड़ी समस्याएं हैं। प्रभु श्रीराम ने 14 वर्ष का वनवास भोगा, पत्नी का वियोग सहन किया लेकिन वे टूटे नहीं, हार नहीं मानी, अवसाद और कुंठा से नहीं घिरे। विपरीत परिस्थिति में भी संघर्ष करने के लिए उठ खड़े होने की ऐसी मानसिक शक्ति की साधना हमारा लक्ष्य होना चाहिए।
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(लेखक डॉ. सच्चिदानंद जोशी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव हैं)
