देसी ठाठ में धोती-बनियान, गमछा और घुंघरू पहन थिरकते हैं पुरुष, पूर्वांचल की मिट्टी से निकला ‘फरुआ नाच’ है बेहद अनोखा
पूर्वांचल का फरुआ नाच, यहां की संस्कृति का जीवंत प्रतीक है, जिसमें पुरुष धोती-बनियान में ऊर्जावान तरीके से थिरकते हैं।

पूर्वांचल की मिट्टी से निकला है फरुआ नाच (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच एक हिस्सा ऐसा भी है, जहां दोनों राज्यों की संस्कृति का मेल देखने को मिलता है। हम बात कर रहे हैं भोजपुरी और अवधि के संगम वाले स्थान पूर्वांचल की। इससे पहले हमने आपको पूर्वांचल के खास नृत्य नटुआ के बारे में बताया था, आज हम यहां के एक और लोकप्रिय नाच फरुआ की बात करने वाले हैं।
पूर्वांचल की मिट्टी से निकला है फरुआ नाच
पूर्वी उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाला फरुआ नाच यहां के जीवंत नृत्यों में गिना जाता है। इसे यूपी में कहीं-कहीं फरुवाही नाच के नाम से भी जाता है। कहते हैं कि यह डांस क्षेत्र के लोगों की दिनचर्या में गहराई से बसा हुआ है, जो सामूहिक खुशी और पूर्वी संस्कृति की सदियों पुरानी झलक दिखाता है। बताते चलें कि यह नाच पश्चिमी बिहार की संस्कृति का भी अहम हिस्सा है।
कैसे किया जाता है यह नृत्य?
इस डांस को बेहद ही ऊर्जावान तरीके से तेज कदमों के साथ थिरकते हुए किया जाता है, जिसमें अच्छे खासे शारीरिक संतुलन की आवश्यकता पड़ती है। जान लेने वाली बात यह है कि इस नृत्य को केवल पुरुष ही करते हैं। वहीं, बात करें इसमें शामिल होने वाले पारंपरिक वाद्य यंत्रों की, तो इसमें खड़ताल, घुंघरू, नक्कड़ और झाल का इस्तेमाल होता है। इन्हीं की लुक धुनों पर नर्तक नाचते-गाते नजर आते हैं।
साधारण पर पारंपरिक वेशभूषा है खास पहचान
दूसरे नृत्यों में आपने नर्तकों को वहां की पारंपरिक वेशभूषा पहने देखा होगा, इस नृत्य में भी ऐसा ही पहनावा है पर वो बहुत ही साधारण है। दरअसल, नर्तक भारी-भरकम पहनावे के बजाय यूपी की आम पोशाक पहने दिखते हैं। उनके तन पर बनियान, कंधे या सिर पर गमछा तो देसी ठाठ के रूप में धोती होती है। वहीं, कभी-कभी नाच में गमछे का इस्तेमाल नाचते हुए प्रॉप यानी साधन की तरह भी होता है।
शादी-त्योहारों में जान डालता है यह नाच
पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस नाच के शुरू होने की जड़ें ही पुराने समय की शादियों और त्योहारों से जुड़ी हुई हैं। पहले के समय में खास आयोजनों में लोग लोकगीतों और नाच के माध्यम से ही अपना मनोरंजन किया करते थे। आज भी सदियों पुराने पूर्वांचल का यह डांस हर कदम पर एक कहानी कहता है।
