‘छलरे-छलरे वाल’ को पंजाबी समझ रहे लोग, असल में इस भाषा का है ये वायरल लोकगीत, पड़ोसी मुल्क से जुड़ा है नाता
इंटरनेट पर वायरल गाना छलरे-छलरे वाल और सम्मी मेरी वार असल में पंजाबी भाषा के गीत नहीं है। ये गीत एक पाकिस्तानी भाषा के हैं।

किस भाषा में गाया गया है छलरे-छलरे वाल? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आजकल सोशल मीडिया पर जिसे देखो वो छलरे-छलरे वाल और सम्मी मेरी वार ही गुनगुना रहा है। ये गाने काफी रील्स से लेकर शॉर्ट्स तक, हर जगह खूब वायरल हो रहे हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं ये गाने पंजाबी में नहीं गाए गए हैं?
जी हां, कई लोग इन्हें पंजाबी गाना मान रहे हैं, लेकिन असल में ये सराइकी भाषा में गाए गए गीत हैं। ये भाषा अपनी मिठास और सूफियाना अंदाज से सभी का दिल जीत रही है। आइए जानें सराइकी कहां बोली जाती है और इस भाषा की खासियत क्या है।
कहां बोली जाती है सराइकी?
सराइकी पाकिस्तान के दक्षिण पंजाब में बोली जाने वाली मुख्य भाषाओं में से एक है। डेरा गाजी खान, मुल्तान, बहावलपुर, मुजफ्फरगढ़ और रहीम यार खान जैसे जिलों में इस भाषा को मुख्य रूप से बोला जाता है। अकेले डेरा गाजी खान में लगभग 86% आबादी सराइकी बोलती है। पूरे पाकिस्तान में लगभग 2.5 करोड़ लोग सराइकी भाषा बोलते हैं।
विभाजन के बाद भारत से गायब हुई सराइकी
भारत और पाकिस्तान के विभाजन से पहले पंजाब क्षेत्र में सराइकी भाषा मुख्य भाषाओं में से एक थी। हालांकि, विभाजन के बाद पाकिस्तान पंजाब से भारत आए लोगों ने धीरे-धीरे हिंदी या पंजाबी अपना ली और सराइकी बोलने वाले लोगों की संख्या भारत में धीरे-धीरे कम होती चली गई। हालांकि, सराइकी भाषा से लोगों का जुड़ाव आज भी कायम है।
सराइकी भाषा है या बोली?
इस सवाल को लेकर लोगों के बीच दो राय देखने को मिलती है। कुछ लोग सराइकी को पंजाबी भाषा की एक बोली मानते हैं, क्योंकि दोनों की व्याकरण और शब्दावली काफी मिलती-जुलती है। वहीं कुछ लोग सराइकी को एक अलग भाषा मानते हैं, जिसकी अपनी पहचान, साहित्य और शब्दों का अलग उच्चारण है।
सराइकी का 4500 साल पुराना इतिहास
सराइकी भाषा का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा है और इसे लगभग 4500 साल पुराना माना जाता है। इस भाषा की सबसे बड़ी खासियत इसका सुफियाना अंदाज और मिठास है। मुल्तान के आसपास के क्षेत्र में जन्मे सूफी संतों ने इस भाषा में कई रचनाएं की।
महान सूफी कवि ख्वाजा गुलाम फरीद ने सराइकी में ही अपनी मशहूर काफियां लिखीं। सराइकी का लहजा काफी मिठास भरा होता है। साथ ही, इसमें पंजाबी के साथ-साथ सिंधी भाषा का भी गहरा असर दिखता है।
