'मेरा नौ डांडी का बीजणा...' हरियाणा का वो ठेठ लोकगीत, जिसके बिना आज भी सूनी है हर शादी की महफिल
यह हरियाणवी लोकगीत संयुक्त परिवार के रिश्तों और पति-पत्नी के अनकहे प्यार को हास्यपूर्ण ढंग से दर्शाता है।

डीजे के दौर में भी कायम है इस हरियाणवी लोकगीत का जलवा (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हरियाणा की संस्कृति और वहां के लोकगीतों की बात ही कुछ निराली है। शादियों का मौसम हो, भात की रस्म हो या फिर खोड़िया की रात, हरियाणवी गीतों के बिना हर जश्न अधूरा लगता है। आजकल इंटरनेट पर डीजे बीट्स वाले गानों की धूम है, लेकिन इन गीतों के पीछे जो ठेठ हरियाणवी जीवन और पारिवारिक रिश्तों की खट्टी-मीठी नोकझोंक छिपी है, उसका आनंद अलग ही है।
आज हम हरियाणा के सदाबहार लोकगीत "मेरा नौ डांडी का बीजणा" के उन मजेदार और असल बोलों की बात करेंगे, जो संयुक्त परिवारों में सास-बहू, जेठानी-देवरानी और पति-पत्नी के खूबसूरत रिश्ते को बयां करते हैं। इस गीत में एक तरफ घर के भारी-भरकम काम हैं, तो दूसरी तरफ एक पति का अपनी पत्नी के लिए अनकहा प्यार।
ससुर का लाड़ और 'झणा-झण' बजता बीजणा
इस गीत की शुरुआत एक नई-नवेली दुल्हन के उस बखान से होती है, जिसमें वह अपने ससुर द्वारा बनवाए गए खास हाथ के पंखे (बीजणे) पर इतरा रही है:
"मेरा नौ डांडी का बीजणा,
मेरे ससुर ने दिया घड़वा...
झणा-झण बाजे बीजणा..."
इन पंक्तियों में दुल्हन खुश होकर बताती है कि उसका नौ डांडियों वाला मजबूत और घुंघरुओं से सजा बीजणा उसके ससुर ने बड़े चाव से बनवाया है। जब वह इसे झलती है, तो इसकी 'झणा-झण' पूरे आंगन में गूंजती है। यह पुराने समय में घर की औरतों के प्रति ससुर के सम्मान और स्नेह का प्रतीक है।
सास-जेठानी के फरमान और पति की फिक्र
हरियाणवी लोकगीतों की असली जान उनमें छिपे हास्य और रोमांस में होती है। पुराने समय में घूंघट और शर्म-लिहाज के कारण पति-पत्नी सबके सामने बात नहीं कर पाते थे, लेकिन इन गीतों में उस रोमांस को बड़ी ही चतुराई से पिरोया गया है। गीत की अगली पंक्तियां इसी शरारत से भरी हैं:
"मेरी सास कवे बहु पीस ले... मेरे राजा जी हिलावे हाथ...
छाले पड़ जा... होए होए होए... छाले पड़ जा हाथ में"
यहां दुल्हन अपनी सखियों को बता रही है कि उसकी सास उसे हाथ की चक्की से अनाज पीसने का फरमान सुनाती है। हालांकि, उसका पति (राजा जी) अपनी पत्नी को इतनी मेहनत करते नहीं देख पाता। वह इशारों में हाथ हिलाकर उसे काम करने से रोकता है, क्योंकि उसे फिक्र है कि कहीं उसकी पत्नी के नाजुक हाथों में 'छाले' न पड़ जाएं।
'धोली होज्या चून मैं...' जेठानी का ताना और पति का प्यार
घर के काम यहीं खत्म नहीं होते। सास के बाद जेठानी का नंबर आता है और गीत के बोल कुछ यूं आगे बढ़ते हैं:
"मेरी जेठाणी कवे तू छान ले... मेरे राजा जी हिलावे हाथ...
धोली होज्या.. होए होए होए... धोली होज्या चून मैं"
अब जेठानी दुल्हन को पीसा हुआ आटा (चून) छानने को कहती है। इस पर भी पति फौरन हाथ हिलाकर मना करता है। उसे लगता है कि आटा छानते वक्त उड़ने वाले चून (आटे) से उसकी खूबसूरत पत्नी सिर से पैर तक सफेद (धोली) हो जाएगी।
देहाती जीवन और रोमांस का बेहतरीन तालमेल
यह लोकगीत दरअसल ग्रामीण महिलाओं के लिए अपनी दिनभर की थकान मिटाने और हंसी-मजाक करने का एक जरिया था। दुल्हन इस गीत के माध्यम से अपनी ननदों और सखियों के सामने मजे लेते हुए दिखाती है कि भले ही सास और जेठानी उससे कितना भी काम करवाना चाहें, लेकिन उसका 'राजा जी' उसे बेहद प्यार करता है और उसे काम करते हुए नहीं देख सकता।
आज भी जब शादियों में महिलाएं ढोलक की थाप पर इस गीत को गाती हैं, तो हर किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। गांव की चौपालों से निकलकर आज यह गीत मॉडर्न शादियों के डीजे फ्लोर और इंस्टाग्राम रील्स की जान बन चुका है। अपनी शानदार लय और इन चुलबुले बोलों की वजह से 'नौ डांडी का बीजणा' हरियाणवी लोक संगीत का वो अनमोल नगीना है, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ सकती।
