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पीले कपड़े, मंगल गीत और मिट्टी की पूजा... क्यों खास है UP-बिहार की शादियों में होने वाली 'मटकोड़' की रस्म?

Published: Thu, 08 Oct 2026 11:10 AM (IST)

अगर आप यूपी या बिहार से हैं, तो आपने शादी वाले घर में 'मटकोड़ रस्म' का नाम जरूर सुना होगा।

यूपी-बिहार की शादियों में आज भी निभाई जाती है मटकोड़ रस्म (Image Source: AI-Generated)

यूपी-बिहार की शादियों में आज भी निभाई जाती है मटकोड़ रस्म (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। शादी-ब्याह का घर हो और रस्मों की धूम न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में शादियों की रौनक ही अलग होती है।

जी हां, यहां एक ऐसी खास परंपरा है, जिसे पूरा किए बिना कोई भी शादी संपन्न नहीं मानी जाती। इस रस्म का नाम है 'मटकोड़'। आइए इस आर्टिकल में समझते हैं कि आखिर यह रस्म क्या है और इसे इतने उत्साह के साथ क्यों मनाया जाता है।

धरती माता का लिया जाता है आशीर्वाद

मटकोड़ का सीधा मतलब है मिट्टी कोड़ना या निकालना। यह रस्म दूल्हे और दुल्हन, दोनों के ही घरों में पूरे विधि-विधान से निभाई जाती है। परिवार के लोग शुभ मुहूर्त देखकर धरती से मिट्टी निकालते हैं और उसकी पूजा करते हैं। मान्यताओं के अनुसार, यह मिट्टी धरती माता का आशीर्वाद होती है। ऐसा विश्वास है कि इसे घर लाने से नए शादीशुदा जोड़े के जीवन में सुख-समृद्धि, आर्थिक मजबूती, रिश्ते में ठहराव और सकारात्मक ऊर्जा आती है।

मंगल गीतों की सजती है रौनक

मटकोड़ की यह रस्म बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। महिलाएं मंगल गीत गाते हुए गांव के बाहर किसी एक तय स्थान पर जाती हैं। इस दौरान शादी वाले घर की 5 सुहागिन महिलाएं अपने साथ बांस की डलिया, कुल्हाड़ी, सिंदूर, अक्षत, जल, जौ, पान और कसैली जैसी शुभ सामग्री लेकर जाती हैं। आज के समय में इस रस्म के दौरान महिलाओं में पीले कपड़े पहनने का भी खूब चलन है। रस्म के दौरान 5 महिलाओं का 'खोईंछा' भी भरा जाता है।

बुआ या बहन निभाती हैं मुख्य भूमिका

इस अनुष्ठान में दूल्हे या दुल्हन की बुआ की भूमिका बहुत खास होती है। अगर बुआ न हों तो घर की बहन कुल्हाड़ी से पांच बार वार करके जमीन से मिट्टी खोदती हैं। इस खोदी गई पवित्र मिट्टी को बांस की डलिया में रखकर बड़े ही आदर और मंगल गीतों के साथ घर लाया जाता है।

घर के आंगन में मिट्टी लाने के बाद पंडित जी पूजा कराते हैं और कलश स्थापित करते हैं। इसी कलश स्थापना के बाद से हल्दी की रस्म शुरू होती है। इस रस्म की सबसे अहम बात यह है कि मंडप के नीचे इसी मिट्टी का इस्तेमाल करके एक चूल्हा बनाया जाता है, जिसे विवाह कार्यों में बहुत शुभ माना जाता है।

परिवारों को अपनी जड़ों से जोड़ती है यह रस्म

मटकोड़ सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि परिवारों को अपनी जड़ों से जोड़ने वाली एक खूबसूरत सांस्कृतिक धरोहर है। हिंदू धर्म में धरती माता को उर्वरता और जीवन का प्रतीक माना गया है। ऐसे में नए जीवन की शुरुआत से पहले धरती से मिट्टी निकालकर उसे मंडप में स्थान देना, असल में प्रकृति के प्रति सम्मान जताने का एक तरीका है। मंगल गीतों और महिलाओं के उत्साह से भरा यह अनुष्ठान शादी के माहौल को पूरी तरह से शुभ, मंगलमय और सकारात्मक बना देता है।

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