भगवान शिव बनते हैं 'श्रोता', नाना-नाती सुनाते हैं अपना दु:ख! बंगाल के 'गंभीरा' लोकनृत्य की परंपरा है बेहद अनोखी
गंभीरा एक ऐसा लोकनृत्य जिसमें ईश्वर भी है, जनता से संवाद भी है और हंसी मजाक भी।

भगवान शिव के आगे फरियाद से जुड़ा है गंभीरा लोकनृत्य (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज हम बात करेंगे पश्चिम बंगाल के लोकनृत्य गंभीरा के बारे में, जिसमें हंसी-ठहाके, भक्ति और सामाजिक कटाक्ष तीनों का मिश्रण बड़ी ही खूबसूरती से देखने को मिलता है। इस नृत्य का संबंध बंगाल की परंपरा से होने के साथ सामाजिक चेतना को जीवतं बनाए रखने से भी है। आइए बंगाल के गंभीरा लोकनृत्य की विस्तार से बात करते हैं।
बंगाल का लोकनृत्य 'गंभीरा'
'गंभीरा' लोकनृत्य का संबंध पश्चिम बंगाल के मालदा जिले से है, यह बंगाल में चैत्र संक्रांति के दिन किया जाता है। बता दें कि इस संक्रांति को लोग बंगाल में नए साल के आगमन के रूप में मनाते हैं। इसमें सामाजिक और क्षेत्रीय मुद्दों को उठाने के लिए नृत्य, नाटक, गीत और व्यंग्य का सहारा लिया जाता है। इसी वजह से बंगाल में इस नृत्य का महत्व परंपरा से कहीं ज्यादा ऊंचा है।
भगवान शिव के आगे फरियाद से जुड़ा है गंभीरा
गंभीरा लोकनृत्य का नाम संस्कृत शब्द गंभीर से पड़ा है, जिसका मतलब गहन या गहरा होता है। गंभीरा शब्द का मतलब यहीं तक सीमित नहीं है, बंगाली लोकपरंपरा में इसे भगवान शिव की गंभीरता और ठहराव के गुण से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है इस नृत्य को लोग भगवान शिव के सामने करते हुए उनसे अपनी फरियाद करते हैं।
वहीं, इसके नाम का दूसरा मतलब गंभीरी से भी जोड़ा जाता है। गंभीरी यानी बंगाल में पूजा का पारंपरिक स्थल। इस स्थल का उपयोग पूजा के साथ-साथ धार्मिक अनुष्ठान और बाकी धार्मिक उत्सवों के लिए भी किया जाता है। बताते चलें कि इस नृत्य की जड़ें पाल और सेन वंश के समय देखी गई हैं।
पुराने समय में गांभीरा थी एक पूजा
पुराने समय में बंगाल में भगवान शिव के लिए गंभीरा नामक पूजा हुआ करती थी, पर मध्यकाल तक आते-आते बंगाल में नए साल के आखिरी दिनों में लोक देवता धर्म ठाकुर के नाम से यह पूजा की जाने लगी। यही वजह है कि बाद में यह पूजा शिव गाजन कही जाने लगी।
कैसे किया जाता है गंभीरा नृत्य?
गंभीरा नृत्य को जोड़े या समूह दोनों में किया जाता है, दरअसल यह लोगों की संख्या पर निर्भर करता है। इस नृत्य में पात्र भगवान शिव, माता पार्वती और मां काली जैसे पौराणिक देवी-देवताओं की भूमिका में होते हैं। सभी के पैरों में घुंघरू बंधे होते हैं।
वाद्य यंत्र में बड़े ढोल जिसे ढाक कहते हैं, इस्तेमाल में लाया जाता है। इसके बाद ढाक की थाप पर भगवान शिव की स्तुति तेज और कर्कश आवाज में गाई जाती हैं और पात्रों के पैर थिरकने शुरू हो जाते हैं। इस दौरान सभी धार्मिक अनुष्ठान भी होते हैं।
वहीं, इस नृत्य के दूसरे चरण में नाट्य रूप समाज को आईना दिखाने का भी काम करता है क्योंकि कलाकार संवाद, गीत और अभिनय और नृत्य दोनों के माध्यम से सामाजिक की नीतियों और आम लोगों की समस्याओं की ओर भी ध्यान आकर्षित करते हैं। इसमें नाना-नाती या दादा-पोते को पात्र की भूमिका में नृत्य और अभिनय दिखाते हैं।
