भाले, बरछे और ढाल से रचा गया कुमाऊं का 'छोलिया', चंदवंश की रानियां भी थीं 1000 साल पुराने इस नृत्य की दीवानी!
छोलिया सिर्फ एक पारंपरिक डांस नहीं, यह युद्ध में जीत का भी प्रतीक है।

तलवारबाजी और मार्शल आर्ट वाला 'छोलिया' नृत्य (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड का एक लोकनृत्य ऐसा भी है, जो 1000 साल पुराना बताया जाता है। इस नृत्य की सबसे खास बात यह है कि इसमें मार्शल आर्ट और डांस दोनों का संगम देखने को मिलता है। हम बात कर रहे हैं कुमाऊं के 'छोलिया' नृत्य की, जिसे पारंपरिक युद्ध लोकनृत्य भी कहते हैं।
तलवारबाजी और मार्शल आर्ट वाला 'छोलिया' नृत्य
उत्तराखंड का छोलिया नृत्य युद्धभूमि में लड़ रहे शूरवीरों की वीरता और पारंपरिक नृत्य का संगम है। यह नृत्य उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में किया जाता है। इसके नाम का मतलब समझें तो दुश्मन को युद्धभूमि में छल से कैसे हराना है, इसी को ध्यान में रखते हुए इसका नाम छोलिया पड़ा है। कहते हैं यह नृत्य 10वीं शताब्दी में शुरू हुआ है, जिसे आज तक कुमाऊं इलाकों में विशेष मौकों और शादी समारोह में किया जाता है।
'छोलिया' नृत्य की लोकमान्यताएं
कहते हैं जब युद्ध जीतने के बाद वीर सैनिक दरबार में लौटते थे, तब जश्न का माहौल होता था। उस समय भाट समाज के लोग दरबार में राजा और उसकी सेना की विजयगाथा गाया करते थे। इस जश्न को जीवंत बनाने के लिए सेना दल भागों में बंटकर पारंपरिक युद्ध की पोशाक पहनते थे, फिर भाले, बरछे, तलवार और ढाल से अपना युद्ध कौशल दिखाते थे। यहीं से तलवारों और ढाल के इस कौशल ने छोलिया नृत्य के रूप में जन्म लिया।
चंद वंशीय रानियों का था पसंदीदा
इस नृत्य को लेकर यह मान्यता भी प्रचलित है कि एक बार चंदवंशीय राजा के दरबार में छोलिया किया गया, युद्ध कौशल और जश्न का मेल रानियों को इतना पसंद आया कि तब से ही यह नृत्य किए जाने की परंपरा ही चल पड़ी।
उस समय जब युद्ध के लिए राजा रवाना होते थे तो लोग उनके साथ लाल झंडा आगे और सफेद झंडा पीछे लेकर चलते थे। इनके बीच में ही छोलिया कलाकर होते थे जो अपने पास ढोल, दमाऊ, मसकबीन और रणसिंघा जैसे वाद्य यंत्र रखते थे।
कैसे किया जाता है यह नृत्य?
छोलिया नृत्य समूह में किया जाता है, जिसमें से एक समूह में 22 लोग होते हैं। इनमें से 8 कलाकार छोलिया नृतक होते हैं जो साथ में तलवारबाजी करते हुए युद्ध कौशल दिखाते हैं। इस समूह में एक कलाकार गीत गाता है, कुछ वाद्य यंत्रा बजाते हैं तो एक कलाकार महिला के भेष में होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह नृत्य महिलाएं नहीं करतीं।
सबसे पहले एक गोल घेरा बना लिया जाता है, ढोल वादक एक व्यूह की रचना कर नृत्य का संकेत देते हैं। इसी घेरे में एक तरफ ढोल और दमाऊ वाद्य यंत्र वादक संगीत की ताल से ताल मिलाते हैं। इसके बाद नृतक अपना प्रदर्शन शुरू करते हैं।
