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बुरी आत्माओं को हराने के लिए किया जाता है लद्दाख का चाम डांस, एक खास मुखौटा पहनकर नृत्य करते हैं बौद्ध भिक्षु

Published: Sat, 10 Oct 2026 02:34 PM (GMT+05:30)

लद्दाख, सिक्किम और तिब्बत के क्षेत्रों में चाम नृत्य किया जाता है, जो बौद्ध धर्म से जुड़ा है।

बौद्ध धर्म में खास महत्व रखता है चाम नृत्य (AI Generated Image)

बौद्ध धर्म में खास महत्व रखता है चाम नृत्य (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप बौद्ध धर्म से जुड़े चाम नृत्य के बारे में जानते हैं? हिमालय की गोद में बसे लद्दाख, तिब्बत, सिक्किम और भूटान की बौद्ध संस्कृति में चाम नृत्य का खास महत्व है। ये बौद्ध भिक्षुओं का एक नृत्य है, जिसमें एक खास तरह का मुखौटा पहना जाता है। 

हालांकि, ये नृत्य मनोरंजन के लिए नहीं किया जाता, बल्कि इसका नाता तंत्र साधना और धर्म की जीत से जुड़ा है। इस नृत्य का इतिहास जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे। आइए जानें चाम नृत्य की शुरुआत कैसे हुई और ये क्यों किया जाता है। 

कैसे हुई चाम नृत्य की शुरुआत?

इस नृत्य का इतिहास तंत्र साधना और तिब्बती बौद्ध धर्म से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि इस नृत्य की शुरुआत 8वीं शताब्दी के अंत में पद्मसंभव ने की थी। कहा जाता है कि जब तिब्बत के राजा ट्रिसान्ग देत्सेन ने सैमये मठ को बनवाने की कोशिश की, तो बुरी आत्माओं और शक्तियों ने उसमें कई मुसीबतें खड़ी कीं। तब राजा ने गुरु पद्मसंभव को आमंत्रित किया। 

गुरु पद्मसंभव ने उस धरती को शुद्ध करने और बुरी शक्तियों का नाश करने के लिए एक खास तांत्रिक नृत्य किया। माना जाता है कि समय के साथ यही तांत्रिक नृत्य चाम नृत्य बना और बौद्ध धर्म की एक खास परंपरा बन गया। 

क्यों किया जाता हैचाम नृत्य?

चाम नृत्य बुराई पर अच्छाई की जीत और बुरी शक्तियों के अंत के प्रतीक के रूप में किया जाता है। माना जाता है कि इस नृत्य तो करने से बुरी शक्तियों का नाश होता है और वो जगह शुद्ध होती है। ये नृत्य मनोरंजन से ज्यादा लोगों के कल्याण के लिए किया जाता है। इस नृत्य को बौद्ध धर्म के देवताओं को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है, ताकि समाज में खुशहाली बनी रहे।  

कैसे किया जाता है चाम नृत्य?

चाम दूसरे लोक नृत्यों से काफी अलग है। इसमें शारीरिक गति से ज्यादा मेडिटेशन, हाथों की मुद्राओं और धार्मिक अनुष्ठानों पर ध्यान दिया जाता है। इस नृत्य को बौद्ध भिक्षु ही करते हैं और इससे पहले वो काफी ध्यान और प्रार्थना करते हैं, जिससे बौद्ध देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है। 

इस नृत्य के लिए बौद्ध भिक्षु रंग-बिरंगे कपड़े पहनते हैं और देवताओं, राक्षसों या जानवरों का मुखौटा लगाते हैं। इस नृत्य के दौरान भिक्षु देवताओं और राक्षसों के रूप में आमने-सामने आते हैं और उनके बीच के युद्ध को नृत्य के जरिए दिखाते हैं। इस नृत्य के दौरान ये मुखौटा पहने भिक्षु कोई साधारण व्यक्ति नहीं रहते, बल्कि वे देवता या दानव ही माने जाते हैं।