विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

भोजपुरी गानों के डांस से बिल्कुल अलग है बिहार का ‘हिरनी-बिरनी’ लोक नृत्य, नट जाति से जुड़ा है इसका इतिहास

Published: Sat, 03 Oct 2026 01:38 PM (IST)

बिहार का लोक नृत्य हिरनी-बिरनी सामाजिक ताने-बाने और पति-पत्नी के रिश्ते को बहुत खूबसूरती के साथ बयां करता है।

बिहार की संस्कृति को दिखाता है हिरनी-बिरनी डांस (AI Generated Image)

बिहार की संस्कृति को दिखाता है हिरनी-बिरनी डांस (AI Generated Image)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार के डांस का नाम सुनकर आपके दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? ऑर्केस्ट्रा या पवन सिंह की फिल्मी गाने, लेकिन बिहार के लोक नृत्य इनसे काफी अलग हैं। इन्हीं लोक नृत्यों में हिरनी-बिरनी भी शामिल है। हिरनी-बिरनी एक नृत्य नाटक है, जिसमें अभिनय, नृत्य और गीत का अनोखा मेल है। 

बिहार का ये लोक नृत्य समाज की उलझनों को पेश करने का एक जरिया है, जो मगध और अंग क्षेत्र में काफी मशहूर है। आइए जानें हिरनी-बिरनी का इतिहास क्या है और इस नृत्य को क्या खास बनाता है। 

क्या है हिरनी-बिरनी की कहानी

हिरनी-बिरनी नृत्य एक पुरानी कहानी पर आधारित है। ये कहानी दो नटिन बहनों, हिरनी और बिरनी की है, जिनके नाम पर इस नृत्य का नाम पड़ा है। दोनों बहनें बहुत सुंदर और चतुर थीं। उनके पास एक बहुत विशाल और शक्तिशाली भैंसा था, जिसका नाम मोहन था। ये भैंसा इतना शक्तिशाली था कि इसे नाथना लगभग नामुमकिन था। दोनों बहनों ने अपनी विवाह के लिए यही शर्त रखी थी कि जो भी वीर उनके भैंसे को नाथ देगा, वो उससे शादी कर लेंगी। 

कई अखाड़ों के पहलवान हिरनी-बिरनी के भैंसे को नाथने आए, लेकिन सभी को हार का मुंह देखना पड़ा। अंत में बावनगढ़ अखाड़े के एक वीर पोसन सिंह ने इस चुनौती को स्वीकार किया और भैंसे को नाथ दिया। शर्त के मुताबिक हिरनी-बिरनी की उससे शादी हो गई, लेकिन पोसन सिंह ऊंची जाति का था और हिरनी-बिरनी नट जाती की थीं।

इसलिए पोसन सिंह को अपने परिवार और समाज से बहिष्कार का सामना करना पड़ा। कहानी में आगे पोसन सिंह और दोनों बहनों के प्रेम और संघर्ष को दिखाया जाता है कि कैसे वो समाज में अपनी जगह वापस पाते हैं।

हिरनी-बिरनी नृत्य का इतिहास

ये नृत्य बिहार की नट जाति से जुड़ा है और मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता आया है। गांव में सामाजिक बंदीशों, जाति व्यवस्था और पति-पत्नी के रिश्ते के खट्टे-मीठे अनुभवों को बयां करने के लिए इस कहानी को गीत और नृत्य के साथ पेश किया जाता था। समय के साथ ये नृत्य वहां की संस्कृति का हिस्सा बन गया और आज भी अभिनय और नृत्य के जरिए हिरनी-बिरनी की कहानी सुनाई जाती है।  

क्यों इतना खास है ये नृत्य?

इस नृत्य के गीत अंगिका और क्षेत्रीय बोलियों में गाए जाते हैं, जो सीधे दिल को छू जाते हैं। साथ ही, इस में समाज का ताना-बाना, बहिष्कार का दर्द और पति-पत्नि के रिश्ते को बहुत ही खूबसूरती से दिखाया जाता है। 

हिरनी-बिरनी नृत्य में नर्तक अपने हाथ-पैरों के मूवमेंट के साथ-साथ चेहरे के हाव-भाव के जरिए भी कहानी को रोमांचक बनाते हैं। इसलिए लोगों को ये नृत्य नाटक देखने में और भी मजा आता है। 

कैसे किया जाता है ये नृत्य?

महिला नर्तक हिरनी और बिरनी की भूमिका में रंग-बिरंगी साड़ियां या घाघरा-चोली पहनती हैं और पुरुष धोती-कुर्ता पहनकर पांरपरिक ग्रामीण वेश-भूषा अपनाते हैं। नर्तक ढोलक, झाल, मंजीरा जैसे वाद्य यंत्रों पर नृत्य करते हैं। मुख्य गायक हिरनी-बिरनी की कहानी गाते हैं और नर्तक ताल पर अभिनय और नृत्य करके इस कहानी को जिंदा करते हैं।