कजरारी आंखें, रजवाड़ी चाल और मीठी बोली... राजस्थानी बींदणी के देसी रोमांस के आगे फीकी है बॉलीवुड की लव स्टोरीज
इस राजस्थानी लोकगीत में एक दुल्हन के दिल की आवाज है, जो अपने पति पर अपना सब कुछ वार देने को तैयार है।

इस राजस्थानी लोकगीत में छिपा है असली रोमांस (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थानी लोकगीत 'बोली प्यारी लागे' में एक बींदणी अपने पति की मीठी बोली, राजपूताना ठाठ-बाट और उसकी रजवाड़ी चाल का बेहद खूबसूरती से बखान कर रही है।
जी हां, राजस्थान के लोकगीतों का जादू ऐसा है कि ये सीधे सुनने वाले के दिल में उतर जाते हैं। जब बात शादी-ब्याह और दांपत्य जीवन की हो, तो पारंपरिक गीतों के बिना हर महफिल अधूरी लगती है।
मॉडर्न लव सॉन्ग्स भले ही कितने भी आ जाएं, लेकिन जो सादगी और प्यार राजस्थानी लोकगीतों में झलकता है, उसकी कोई बराबरी नहीं। ऐसा ही एक बेहद सुरीला और प्यार से भरा लोकगीत है- 'बोली प्यारी लागे... थारी सूरत प्यारी लागे'।
इस राजस्थानी लोकगीत में छिपा है पुराने जमाने का रोमांस
बोली प्यारी लागे, थारी सूरत प्यारी लागे,
केसरिया बनड़ा, ओ थारी बोली प्यारी लागे।
हरियाला बनड़ा, ओ थारी सूरत प्यारी लागे।
इन शुरुआती पंक्तियों में दुल्हन अपने पति पर प्यार लुटाते हुए उसे लाड से 'केसरिया बनड़ा' और 'हरियाला बनड़ा' पुकार रही है। वह कहती है कि हे मेरे पिया, मुझे तुम्हारी सिर्फ सूरत ही नहीं, बल्कि तुम्हारी बोली भी बहुत मीठी लगती है। यह इस बात का प्रतीक है कि दांपत्य जीवन में बाहरी सुंदरता के साथ-साथ साथी के मीठे बोल भी रिश्ते को मजबूत और खूबसूरत बनाते हैं।
पति की 'झीणी नजरिया' देख दीवानी हो गई दुल्हन
हाथां में तलवारां, थारे कमर कटारा सोवे,
काना रा गजमोती, म्हाने झीणी नजरिया जोवे।
ओ राज बन्ना, थारी बोली प्यारी लागे...
यहां राजपूताना ठाठ-बाट और शौर्य का बेहद शानदार वर्णन है। दुल्हन कहती है कि तुम्हारे हाथों में तलवार और कमर पर सजी कटार तुम्हारी मर्दानगी और शान को बढ़ा रही है। तुमने कानों में जो 'गजमोती' पहन रखे हैं, वो तुम्हारे रूप को और निखार रहे हैं। हालांकि, सबसे ज्यादा दिल को वो बात छूती है, जब तुम मुझे अपनी तिरछी नजरों से छिप-छिपकर निहारते हो। यह पंक्ति उस मीठी झिझक और बिना बोले आंखों ही आंखों में होने वाले रोमांस को दर्शाती है।
दूल्हे की आंखों का 'काजल' कर गया कमाल
माथे री मेमन्द सोवे, रूपाली घूंघट री ओट,
बन्ना थारे काजळिये री, म्हाने लागे गहरी चोट।
ओ राज बन्ना, थारी बोली प्यारी लागे...
इन पंक्तियों में राजस्थानी पारंपरिक श्रृंगार की झलक है। दुल्हन कहती है कि मेरे माथे पर पारंपरिक आभूषण सजा है और मैंने चांदी सा चमकता सुंदर घूंघट निकाल रखा है। इस घूंघट की ओट से जब मैं तुम्हारी आंखों में लगा काजल देखती हूं, तो वो मेरी भावनाओं पर गहरी चोट करता है। यानी, बन्ना की कजरारी आंखें दुल्हन के दिल को पूरी तरह बेकाबू कर रही हैं। यह पंक्ति बताती है कि कैसे पुराने समय में घूंघट के पीछे से ही प्रेम की एक पूरी दुनिया बस जाती थी।
आखिरी अंतरे में छिपा है सुखी शादी का सबसे बड़ा राज
पगल्यां री मोजड़ी सोवे, थारी रजवाड़ी है चाल,
जोवे थारी बींदणी, बन्ना थे हो म्हारो गुलाल।
बोली प्यारी लागे, थारी सूरत प्यारी लागे...
गीत के अंत में पति के शाही अंदाज की तारीफ है। दुल्हन कहती है कि तुम्हारे पैरों में राजस्थानी मोजड़ी बहुत जंच रही है और तुम्हारी चाल में एक अलग ही रजवाड़ी ठसक है। तुम्हारी बींदणी बस तुम्हें ही निहार रही है, क्योंकि हे बन्ना, तुम ही मेरे जीवन का 'गुलाल' हो। गुलाल यहां खुशियों, रंगों और प्रेम का प्रतीक है। दुल्हन यह स्वीकार कर रही है कि उसके जीवन के सारे रंग और सारी खुशियां सिर्फ उसके पति से ही हैं।
'बोली प्यारी लागे...' सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि पति-पत्नी के रिश्ते की वो मजबूत डोर है, जो मीठी बातों, आपसी सम्मान और छोटी-छोटी अदाओं पर टिकी होती है। आज भी जब राजस्थानी शादियों में यह गीत बजता है, तो हर बींदणी अपने केसरिया बनड़े में इन्हीं खूबियों को तलाशती है।
