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‘मिश्री को बाग लगा दे रसिया..’, पहले साजन से नोंकझोंक, फिर पड़ोसन से जलन तक पहुंचती है इस लोकगीत की कहानी

Published: Tue, 06 Oct 2026 04:05 PM (IST)

यह लोकगीत पति-पत्नी के रिश्ते की नोंक-झोंक, प्यार और पड़ोसन से जलन जैसे पहलुओं को खूबसूरती से दर्शाता है।

नीम की कड़वाहट से शुरू होकर मिश्री की मिठास पर खत्म होता है लोकगीत (Image Source: AI Generated)

नीम की कड़वाहट से शुरू होकर मिश्री की मिठास पर खत्म होता है लोकगीत (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। लोकगीत रिश्तों को छोटी-छोटी कहानियों में बताने की एक खूबसूरत कला है और इस कला में राजस्थान ने भी महारत हासिल कर रखी है। यहां के लोकगीतों में रोजमर्रा के काम में इस्तेमाल होने वाली चीजों को प्रतीक के तौर पर दिखाया जाता है, फिर चाहे वो ऊंट का गहना हो, जीरा हो या पानी की मटकी। 

यहां का ऐसा ही एक लोकगीत है ‘मिश्री को बाग लगा दे रसिया’ जिसमें पति-पत्नी की नोंक-झोंक को बड़ी ही सुंदरता से बयां किया गया है। 

नीम की कड़वाहट से शुरू, मिश्री की मिठास पर खत्म  

अगर आप प्रेम प्रसंग पर आधारित लोकगीतों की सूची निकालेंगे तो यह गीत उनमें टॉप 10 में जरूर गिना जाएगा। इन दिनों दशकों पुराना यह गाना फिर से सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा है, जिसकी कहानी नीम की कड़वाहट से शुरू तो होती है, पर अंत मिश्री की मिठास के साथ होता है। 

गीत में नायिका अपने प्रेमी को कहती है : ‘मिसरी को बाग लगा दे रसिया, नीम की निम्बोली म्हाने खारी लागे!’ वह अपने साजन से नीम की निंबोली कड़वी होने के चलते कुछ मीठा खाने की मांग कर रही है। 

मीठी-मीठी बातों से अपनी बात मनवा लेती है नायिका 

महिलाओं की आदत को कौन नहीं जानता, वो हमेशा अपनी प्यारी और मीठी बातों से अपने प्रेमी को किसी भी तरह ही मना ही लेती हैं। इस गीत में यही खूबसूरती देखने को मिलती है। नायिका अपने पति के सांवले रंग और रंग-रंगीले अंदाज की खूब तारीफ कर रिझाने की कोशिश करती है। 

पड़ोसन से जलन का भाव गीत में जाहिर 

इस लोकगीत में नायिका की अपनी सामने वाली पड़ोसन को लेकर जलन भी साफ तौर पर दिखाई देती है। वो कहती है कि ‘सामली पाड़ोसन तीखो सुरमो सारे, ठुमका करती, छमछम चाले, वा तो फुट.ड़ी सी...म्हाने एक झारी लागे..उजड़ी सी म्हाने एक क्यारी लागे’ यानी पड़ोसन तीखा सुरमा लगाकर ठुमककर छम-छम करती चलती है, वह सुंदर तो है लेकिन मुझे एक खाली बर्तन और बगीचे की उजड़ी हुई क्यारी लगती है। 

इस गीत के ये बोल पति-पत्नी की हर रोज की खिट-पिट, प्यार, रूठने-मनाने के उस सिलसिले को दिखाते हैं, जिसका कभी अंत नहीं होने वाला। 

पति की हरकतों पर ताना

नायिका अपने साजन की हरकतों पर उसे ताना मारती भी नजर आती है, जिसके बोल कुछ ऐसे हैं: ‘थे भी तो..बीने लुक छिप झांको, खिड़की खोलो, झुक झुक ताको, म्हाने सामली पाड़ोसन कामणगारी लागे’ यानी आप भी तो पड़ोसन को खिड़की खोलकर छिप-छिप कर देखते हो। इसके बाद वो पड़ोसन को ही जादू टोना करने या पति को वश में करने वाली महिला कह डालती है। 

यह गीत लोगों का मनोरंजन तो करता ही है, पर साथ में रिश्तों के ताने-बाने की तस्वीर भी दिखाता है। इसमें जलन, अपने पति पर अधिकार की भावना और पड़ोसन से तुलना करने जैसी बातें लोगों को अपने अनुभवों से जोड़ने में मदद करती है। शायद यही वजह है कि जब भी कोई इस गीत को सुनता है, तो कहीं न कहीं वह भी अपने रिश्तों की रोजाना की नोंक-झोंक को फिर से महसूस कर रहा होता है।