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शारदा सिन्हा का यह देवी गीत सुन भक्तिमय होगा माहौल, मां के चरण पखारने से आरती तक; समाई है पूजा की पूरी विधि

Published: Sun, 11 Oct 2026 03:29 PM (IST)

शारदा सिन्हा का प्रसिद्ध देवी गीत 'जगदम्बा घर में दियरा बार अइनी हे' केवल एक धुन नहीं, बल्कि मां दुर्गा की भक्ति और पूजा विधि का सुंदर चित्रण है।

मां दुर्गा की भक्ति में डुबो देगा ये देवी गीत (Image Source: AI-Generated)

मां दुर्गा की भक्ति में डुबो देगा ये देवी गीत (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार में नवरात्र का जश्न हो, पूजा के पंडाल सजे हों और 'जगदम्बा घर में दियरा बार अइनी हे...' ना बजे, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। इस गीत में एक ऐसा जादू है जो शोर-शराबे के बीच भी इंसान को देवी भक्ति में लीन कर देता है।

चाहे दोस्तों-परिवार के साथ पंडाल घूमना हो या घर में सुबह-शाम की आरती का वो खास पल, यह गाना हर प्ले-लिस्ट की जान है। हालांकि, मां दुर्गा की भक्ति में इस गीत को गुनगुनाते और सुनते हुए क्या आपने कभी सोचा है कि इन शब्दों का असल मायना क्या है?

क्या आप जानते हैं कि इस गाने की बुनियाद में कितनी गहरी आस्था, श्रद्धा और एक भक्त के समर्पण की बेहद प्यारी-सी कहानी बुनी हुई है? आइए, आज बिहार-यूपी के 'आंगन' की कच्ची पगडंडियों से निकलकर दुनियाभर के पंडालों की शान बनने वाले इस शानदार लोकगीत के पीछे का राज जानते हैं।

Jagdamba Ghar Mein Diyara

(Image Source: AI-Generated)

मां के दरबार में श्रद्धा का दीपक जलाता है भक्त

यह मिथिला और भोजपुरी माटी की पारंपरिक 'देवी पचरा' और लोकगीत शैली में रचा गया एक पारंपरिक भक्ति गीत है। वैसे तो इसे कई गायकों ने गाया है, लेकिन स्वर कोकिला शारदा सिन्हा ने अपनी खनकती आवाज से इसे हमेशा के लिए अमर कर दिया।

इस गाने में 'जगदम्बा घर में दियरा' का मतलब होता है 'मां जगदम्बा के दरबार में दीपक', और 'बार अइनी हे' का अर्थ है 'जलाने आई हूं'। कुल मिलाकर यह लाइन उस भक्त के बारे में है, जो मां जगतारन (संसार का उद्धार करने वाली) के दरबार में हाजिरी लगाने और उनके चरणों में अपने श्रद्धा का दीपक प्रज्वलित करने पहुंचता है।

इस देवी गीत में क्यों है 'सोने की सुराही और थाली' का जिक्र?

इस गीत के बोल भले ही बहुत आसान लगते हों, लेकिन इनके पीछे छुपे जज्बात बहुत मजबूत हैं। इस गीत में एक भक्त की भावना और देवी पूजन की पूरी विधि को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाया गया है:

"सोने सुराही गंगाजल पानी
मैया जी के चरण पखार अइनी हे
जगतारण घर में दियरा बार अइनी हे
जगदम्बा घर में दियरा बार अइनी हे"

इन पंक्तियों के जरिए भक्त की उस भावना को पिरोया गया है, जिसमें वह सबसे पहले सोने की सुराही में पवित्र गंगाजल लेकर मां के चरण पखारने आता है। गीत जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, भक्त सोने की थाली में स्वादिष्ट व्यंजन परोसकर मां को भोग लगाता है और अंत में कंचन के थाल में कपूर की बाती जलाकर मां की आरती उतारता है।

यहां जो 'सोने की थाली' और 'सोने की सुराही' का जिक्र है, वह सिर्फ भौतिक दौलत या दिखावा नहीं है, बल्कि वह उस भक्त की मां के प्रति सबसे शुद्ध, पवित्र और मूल्यवान भावना का प्रतीक है। वह अपनी सामर्थ्य का सर्वश्रेष्ठ हिस्सा मां के चरणों में अर्पित करना चाहता है।

माहौल में घोल देता है भक्ति रस

इस गीत की धुन इतनी सात्विक और शब्द इतने आसान हैं कि यह तुरंत जुबान पर चढ़ जाता है। इसी खासियत ने इसे बिहार-यूपी के छोटे-छोटे गांवों और चौपालों से निकालकर बड़े-बड़े शहरों के भव्य दुर्गा पूजा उत्सवों तक पहुंचा दिया।

जब भी कलश स्थापना होती है या महानवमी की पूजा होती है, तो यह गाना माहौल में एक अलग ही जान और पवित्रता फूंक देता है। यह गीत सिर्फ बैकग्राउंड में बजने के लिए नहीं है, बल्कि यह लोगों को अपनी माटी से जोड़ने और मिलकर आस्था प्रकट करने का एक खूबसूरत जरिया बन चुका है।

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