ओरछा में श्रीराम को मिलती है पुलिस की सलामी, रीवा में लक्ष्मण को मिला राजपाट; अनोखी है बुंदेलखंड की परंपरा
बुंदेलखंड में श्रीराम को देवता के साथ सम्राट के रूप में पूजा जाता है, जहां ओरछा में उन्हें पुलिस गार्ड ऑफ ऑनर देती है।

अयोध्या से रामलला का आगमन और अनोखी शर्त (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बुंदेलखंड में भगवान श्रीराम देवता ही नहीं सम्राट के रूप में भी पूजे जाते हैं। मध्य प्रदेश की दो शक्तिशाली रियासतों बुंदेल वंश और बघेल वंश में भगवान श्रीराम का राजसी वैभव निराला है। ओरछा स्थित श्रीराम राजा सरकार की सम्राट की गद्दी सात सौ साल पुरानी है। यहां पुलिस के जवान उन्हें रोजाना गार्ड ऑफ ऑनर देते हैं। वहीं रीवा में बघेल वंश के राज परिवार में भगवान श्रीराम को आज भी मुख्य सिंहासन पर विराजमान किया गया है।
इस राजवंश ने लक्ष्मण को राजा माना है। सिंहासन पर श्रीराम और माता सीता के साथ लक्ष्मण को विराजमान किया है। यहं विजयादशमी पर पुराना राजशाही वैभव जीवंत हो उठता है। श्रीराम राजा सरकार के वैभव का वर्णन कर रहे हैं टीकमगढ़ से मनीष असाटी और रीवा से श्याम मिश्रा...
मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले में बेतवा नदी के तट पर बसी ऐतिहासिक नगरी ओरछा अपनी भव्य वास्तुकला और अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। वर्ष 1501 में बुंदेला राजपूत शासक राजा रुद्र प्रताप सिंह द्वारा स्थापित यह रियासत अपनी राजनीतिक और सैन्य ताकत के साथ -साथ अपने अद्भुत धार्मिक इतिहास के लिए जानी जाती है। यहां के राजवंश ने कभी खुद को सर्वोपरि नहीं माना, बल्कि अपनी संपूर्ण सत्ता भगवान श्रीराम को समर्पित कर दी।
ओरछा का इतिहास करीब 700 साल पुराना है,जहां वीर सिंह जू देव और मधुकर शाह जैसे प्रतापी राजाओं ने शासन किया। किंवदंतियों के अनुसार राजा मधुकर शाह की पत्नी रानी गणेश कुंवरी अपनी अगाध भक्ति के बल पर अयोध्या से भगवान श्रीराम की मूर्ति को ओरछा लेकर आईं थीं। तब से ओरछा में भगवान श्रीराम ही इस रियासत के असली राजा माने जाते हैं। प्रशासनिक स्तर पर उन्हें पुलिस बल द्वारा रोजाना गार्ड आफ आनर दिया जाता है।
अयोध्या से रामलला का आगमन और अनोखी शर्त
सोलहवीं शताब्दी में राजा मधुकर शाह की पत्नी रानी गणेश कुंवरी अयोध्या से बाल रूप में भगवान श्रीराम को ओरछा लेकर आई थीं। भगवान श्रीराम ने शर्त रखी थी कि वह जिस स्थान पर पहली बार विराजित होंगे, वहीं सदा के लिए स्थापित हो जाएंगे और वही स्थान उनके राजा के रूप में शासन का केंद्र बनेगा।
रानी ने उन्हें महल के रसोईघर में रखा, जिसके बाद वह वहीं स्थिर हो गए। तब से ओरछा के तत्कालीन राजवंश ने अपनी पूरी सत्ता भगवान श्रीराम को सौंप दी और खुद उनके दीवान बनकर राज्य का कामकाज संभालने लगे।
पुलिस की सलामी और राजा की अनोखी मर्यादा
ओरछा में आज भी भगवान श्रीराम को सत्तारूढ़ सम्राट की तरह माना जाता है। प्रतिदिन मध्य प्रदेश पुलिस के जवानों द्वारा भगवान श्रीराम को गार्ड आफ आनर दिया जाता है। इसके अलावा परंपरा के अनुसार ओरछा में केवल एक ही राजा रह सकते हैं, इसलिए आज भी कोई अन्य वीआइपी या जनप्रतिनिधि ओरछा की चहारदीवारी में रात्रि विश्राम नहीं करता है।
मंत्रमुग्ध करती हैं बेतवा के तट पर शाही छतरियां
अध्यात्म के साथ-साथ ओरछा मध्यकालीन बुंदेला वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। यहां बने विशाल राज महल, जहांगीर महल, और चतुर्भुज मंदिर तत्कालीन शिल्पकारों की बेजोड़ कलाकारी बयां करते हैं। मुगल सम्राट जहांगीर के स्वागत में बना जहांगीर महल बुंदेला और मुगल शैली का अद्भुत समन्वय है। बेतवा नदी के तट पर कंचना घाट के पास बनी शाही छतरियां इस ऐतिहासिक नगर के गौरवशाली अतीत को दर्शाती हैं, जहां ढलते सूरज की किरणें पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
विजयादशमी पर जीवंत हो उठता है रीवा का 400 साल पुराना राजशाही वैभव
कभी विंध्य की राजधानी रहे रीवा में बघेल राजवंश के 400 साल पुराने गौरव, शौर्य और संस्कृति का जीवंत प्रदर्शन विजयादशमी पर होता है। सुबह गोविंदगढ़ पैलेस और रीवा किले का वैभव देखने लायक रहता है। 1617 में बांधवगढ़ से राजधानी यहां स्थानांतरित होने के बाद 22वें महाराज विक्रमादित्य सिंह जुदेव ने भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी को सिंहासन पर बैठाया था।
विजयादशमी पर चल समारोह में एक रथ पर भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता, दूसरे रथ पर महाराजाधिराज की गद्दी और तीसरे रथ पर बघेल राजवंश के मुखिया सवार होते हैं। राजपरिवार के कुलगुरु द्वारा शस्त्र पूजन किया जाता है। इस दिन बघेल वंश के आराध्य भगवान श्रीराम के प्रतीक नीलकंठ के दर्शन को शुभ माना जाता है। दोपहर बाद हाथी पर अंबारी सजती है, घोड़ों पर बघेल राजवंश का ध्वज फहराया जाता है और आगे-आगे नगाड़े-निशान बजते हैं।
राज परिवार के मुखिया पुष्पराज सिंह जूदेव पारंपरिक बघेली पगड़ी, अंगरखा, कमर में तलवार और गले में पन्ना का हार पहनकर बाहर आते हैं। शाही सवारी के दौरान अस्त्र-शस्त्र लिए सैनिक, हाथी-घोड़ा पर सवार सेनापति भी होते हैं। रास्ते में हजारों लोग फूल-माला लेकर खड़े रहते हैं। बुजुर्ग आज भी इस दिन महाराजा के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और "महाराज की जय" के नारे लगते हैं। एनएससी ग्राउंड में भगवान श्रीराम और रावण का युद्ध और रावण दहन का आयोजन होता है।
