सिर्फ नाटक ही नहीं, डांस और रागिनी से रंग जमाता है हरियाणा का स्वांग; ठेठ बोली में कलाकार सुनाते हैं कहानी
स्वांग हरियाणा की लोक संस्कृति का हिस्सा है। इसका इतिहास भी काफी दिलचस्प है।

क्यों खास है हरियाणा का स्वांग? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हरियाणा की लोक संस्कृति सिर्फ हरियाणवी गानों तक सीमित नहीं है। इसमें स्वांग भी शामिल है। ये हरियाणा का मशहूर लोक नाट्य है, जिसमें म्यूजिक, डांस, एक्टिंग, मिमिकरी और डायलॉग्स का अनोखा मेल देखने को मिलता है।
स्वांग हरियाणा के साथ-साथ राजस्थान, पंजाब और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में भी देखने को मिलता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वांग की शुरुआत कैसे हुई? आइए जानें स्वांग का इतिहास और इसकी खासियत क्या है।
क्या है स्वांग का इतिहास?
स्वांग का मतलब होता है नकल करना। इसमें कलाकार पौराणिक कथाओं, ऐतिहासिक घटनाओं या समाज से जुड़े मुद्दों पर अलग-अलग कैरेक्टर्स का रूप लेते हैं और नाटक पेश करते हैं। स्वांग की जड़ें काफी पुरानी हैं और भक्ति आंदोलन से जुड़ी हुई मानी जाती है। शुरुआती दौर में स्वांग मुख्य रूप से धार्मिक और पौराणिक कथाओं पर आधारित होते थे, जैसे राजा हरिशचंद्र या भक्त प्रह्लाद की कहानी।
धीरे-धीरे स्वांग लोगों के बीच मशहूर हुआ और इसके स्वरूप में भी काफी बदलाव आए। धीरे-धीरे इसमें पौराणिक कथाओं के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों से जुड़े नाटक भी पेश किए जाने लगे। 19वीं सदी में स्वांग को लोकप्रिय बनाने और उसे नया स्वरूप देने में दीपचंद बहमन की अहम भूमिका रही।
ॉइनके बाद लखमीचंद और पंडित मूल चंद जैसे कलाकारों ने इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। समय के साथ स्वांग सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं रहा। ये समाज की रूढियों, जातिगत भेदभाव, छूआछूत और कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाने का भी एक माध्यम बन गया।
क्या है स्वांग की खासियत?
स्वांग की खासियत है कि इसके लिए किसी बड़े स्टेज की जरूरत नहीं पड़ती। इसे आमतौर पर खुले मैदानों या गांव के चौपालों पर किया जाता है, जहां आम लोग आसानी से इसे देख सकें। स्वांग में नाटक के साथ-साथ नृत्य और संगीत भी शामिल होता है। आमतौर पर रागिनी शैली में गाए जाने वाले गीतों पर हरियाणा में स्वांग पेश किया जाता है।
इसके डायलॉग भी ठेठ हरियाणवी भाषा में होते हैं, जिसके कारण लोग इससे बेहतर तरीके से कनेक्ट कर पाते हैं। इसके अलावा, इसे ब्रज और दूसरी स्थानीय बोलियों में भी पेश किया जाता है, ताकि दर्शक इससे जुड़ाव महसूस कर पाएं।
पुराने समय में स्वांग में महिलाएं हिस्सा नहीं लेती थीं। इसलिए महिलाओं के किरदार भी पुरुष ही निभाया करते थे। इसके अलावा, स्वांग करते समय रंग-बिरंगे कपड़े पहने जाते हैं, ताकि नाटक देखने में आकर्षक लगे।
कैसे किया जाता है स्वांग?
स्वांग की शुरुआत हमेशा गणेश वंदना या सरस्वती वंदना से की जाती है। इसके बाद सूत्रधार कहानी के बारे में दर्शकों को बताता है और कलाकार अभिनय करते हुए मंच पर आते हैं। स्वांग में किरदारों के बीच बातचीत को दिखाने के लिए छंद या कविताओं का इस्तेमाल किया जाता है और रागिनी भी गाई जाती है, जो स्वांग को और भी मजेदार बना देती है। इसमें व्यंग्य और मजाकिया किरदारों के जरिए माहौल को हंसी-मजाक वाला भी बनाया जाता है, ताकि दर्शकों की रुचि बनी रहे।
