अपभ्रंश से खड़ी बोली और अब AI तक, कितना लंबा रहा है हिंदी का सफर? बेहद दिलचस्प है इस भाषा का इतिहास
हिंदी भाषा का इतिहास 1500 से ज्यादा सालों का है। ये भाषा संस्कृत और अपभ्रंश से होते हुए आज की खड़ी बोली तक पहुंची है।

कैसा रहा है हिंदी का इतिहास? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत की संस्कृति की तरह, यहां की बोली में भी काफी विविधता है। हमारे देश में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं, जिनकी अपनी खूबसूरती और पहचान है। इन भाषाओं में हिंदी को खास स्थान हासिल है।
हिंदी बातचीत के साथ-साथ साहित्य की भी अहम भाषा है। इस भाषा में कई रचनाएं हैं, जो दुनियाभर में मशहूर हैं। इस भाषा के महत्व को याद दिलवाने और इसके प्रचार के लिए हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं आज हिंदी जिस स्वरूप में है, वहां पहुंचने का सफर कितना लंबा और दिलचस्प रहा है? आइए जानें हिंदी का इतिहास।
क्या है हिंदी का इतिहास?
हिंदी दुनिया की सबसे समृद्ध भाषाओं में से एक है, जिसका इतिहास 1500 सालों से भी ज्यादा पुराना है। सदियों से इसके स्वरूप में कई बदलाव आए हैं, जिनका नतीजा हमारी आज की हिंदी है। हिंदी की जड़ें संस्कृत से निकलती हैं, जो प्राचीन भारत में बोली जाती थी। संस्कृति और दूसरी स्थानीय भाषाओं से निकलकर हिंदी आज के स्वरूप तक पहुंची है।
10वीं-15वीं सदी की हिंदी
स्कृत से आम जनमानस की बोलियां विकसित हुईं। इस दौर में पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाएं प्रचलित हुईं। हिंदी भाषा इन्हीं से मिलकर बनी है। इसमें अपभ्रंश को हिंदी के सबसे करीब माना जाता है। अपभ्रंश से उत्तर रूपी हिंदी का जन्म हुआ, जिसने धीरे-धीरे खड़ी बोली का रूप लिया। ये भाषा उत्तर भारत में बोली जाती थी।
उस काल में हिंदी के स्वर भी सीमित थे, लेकिन फारसी, तुर्क और पाश्तो के शब्दों के साथ हिंदी में नए अक्षर जुड़े। इन्हीं के साथ कई नए शब्द भी हिंदी में शामिल हुए। जहां नए शब्द हिंदी में शामिल हुए, वहीं अपभ्रंश के कुछ शब्द लुप्त भी हो गए।
15वीं-18वीं सदी की हिंदी
इस काल में हिंदी की ध्वनि और व्याकरण में काफी बदलाव हुए। मुगलकाल में फारसी भाषा का प्रचलन बढ़ा, जिससे उच्च वर्ग के लोगों की हिंदी में फारसी के कई शब्दों ने जगह बनानी शुरू की। इसी दौर में शब्दों के पीछे से ‘अ’ का उच्चारण भी गायब होने लगा, जैसे- रामा हो गया राम। इसी वजह से उत्तर और दक्षिण के शब्दों में ये फर्क देखने को मिलता है।
साहित्य में हिंदी
हिंदी को आज के रूप में ढालने में साहित्य का भी बड़ा योगदान रहा। आदिकाल में पिंगल और अपभ्रंश मिश्रित भाषा में रासो साहित्य लिखा गया। भक्तिकाल में गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस लिखी और सूरदास ने ब्रजभाषा में अपने पदों की रचना कर इन बोलियों को आम जनता तक पहुंचाया।
19वीं सदी में भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी बोली में साहित्यों की रचना की। वहीं, मुंशी प्रेमचंद और हरिशंकर परसाई जैसे लेखक साहित्य की हिंदी को आम बोलचाल के करीब लाए।
हिंदी का आधुनिक स्वरूप
प्रिंटिग प्रेस आने के बाद और स्वतंत्रता संग्राम में नेताओं ने हिंदी भाषा के इस्तेमाल का आह्वान किया और इस भाषा का काफी प्रचार हुआ। स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को देवनागरी लिपी में लिखी जाने वाली हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। आज हिंदी सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में जानी जाती है। इंटरनेट और एआई के आने के बाद इसके प्रचार में और भी तेजी आई है।
