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रेसिपी से रिश्तों तक, अब AI को अपना दोस्त बना रहीं महिलाएं; लेकिन इन 5 बातों में बरतें सावधानी

By N.NavrahiEdited By: Harshita Saxena
Published: Fri, 11 Sep 2026 05:14 PM (IST)

एआई अब सिर्फ तकनीक नहीं, महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है। कई महिलाएं इससे अपनी ...और पढ़ें

रोजमर्रा के कामों में मददगार AI, पर इन बातों का रखें ध्यान (Picture Credit- AI Generated)

रोजमर्रा के कामों में मददगार AI, पर इन बातों का रखें ध्यान (Picture Credit- AI Generated)

HighLights

  1. AI महिलाओं के दैनिक कार्यों और जानकारी जुटाने में सहायक

  2. रेसिपी, बच्चों की पढ़ाई, निजी उलझनों में AI की मदद

  3. महत्वपूर्ण फैसलों में AI पर पूरी तरह निर्भर न हों

एन नव, नई दिल्ली। सुबह-सुबह रसोई में काम करते हुए नोएडा में रहने वाली सारिका अग्रवाल के सामने सवाल था, आज खाने में क्या बनाया जाए? फ्रिज में रखी कुछ सब्जियों की तस्वीर उन्होंने एआई को भेजी और कुछ ही सेकंड में कई रेसिपी उनके सामने थीं। थोड़ी देर बाद बच्चे के स्कूल प्रोजेक्ट के लिए आइडिया चाहिए था तो उन्होंने एआई से पूछ लिया।

इंटरनेट मीडिया पर बनाए जाने वाले अपने वीडियो का टापिक भी वह एआई से ही पूछती हैं। बात यहीं तक नहीं रुकती। कहीं जाना हो तो कपड़ों की मैचिंग से लेकर नई गाड़ी कब खरीदनी है और उसकी पूजा कहां करवानी है, इसकी सलाह भी वह एआई से लेती हैं। हां, मुहूर्त के लिए बाद में ज्योतिषी से पूछ लेती हैं। सारिका का मानना है कि किसी भी विषय में पहले से जानकारी हासिल कर लेने पर कोई उन्हें आसानी से मूर्ख नहीं बना सकता। इसलिए लगभग हर विषय पर वह पहले एआई से जानकारी लेती हैं और फिर अपनी समझ से फैसला करती हैं।

सारिका अकेली नहीं हैं। अब एआई कई महिलाओं की जिंदगी में सिर्फ जानकारी देने वाला माध्यम नहीं, बल्कि ऐसा साथी बनता जा रहा है, जिससे वे छोटी-बड़ी बातें पूछने लगी हैं। क्या पहनें, क्या पकाएं, कहीं जाने पर क्या देखें, किसी चीज के बारे में सही जानकारी क्या है, बच्चे की पढ़ाई में कैसे मदद करें या किसी उलझन में क्या विकल्प हो सकते हैं, एआई हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार है। यहीं से सवाल भी पैदा होता है। जिस एआई को हम अपनी ‘सहेली’ की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं, क्या वह सचमुच हमारी भावनाओं को समझता है? और कहीं ऐसा तो नहीं कि सुविधा देते-देते हम अपने सोच और फैसलों के लिए भी उस पर निर्भर होने लगें?

हर सवाल का जवाब देने वाली ‘सहेली’

एआई की सबसे बड़ी खूबी शायद यही है कि वह सवाल पूछने पर आपको रोकता नहीं। आप एक ही सवाल बार-बार पूछ सकते हैं, अपनी बात बदलकर कह सकते हैं और अपनी जरूरत के हिसाब से जवाब मांग सकते हैं। यही वजह है कि महिलाओं के लिए यह रोजमर्रा के कामों में तेजी से उपयोगी हो रहा है। एआई एक्सपर्ट और प्लस91 लैब्स के सह-संस्थापक तुषार धवन कहते हैं, ‘एआई विशेषज्ञों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक से आगे बढ़कर अब रोजमर्रा की उत्पादकता, सीखने और नए अवसरों का साधन बन रहा है। महिलाओं के लिए यह खास तौर पर बदलावकारी हो सकता है।

यह उनका समय बचाने, रोजमर्रा के कामों को आसान बनाने और ज्ञान व नई स्किल्स तक पहुंच बनाने में मदद कर सकता है।’ उनके अनुसार, महिलाएं प्लानिंग, रिसर्च, कम्युनिकेशन, कंटेंट तैयार करने, अनुवाद और नई स्किल्स सीखने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रही हैं। गृहिणियां रोजाना के कामों की योजना बनाने, नई स्किल सीखने या छोटे बिजनेस के आइडिया तलाशने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकती हैं यानी जिस काम के लिए पहले कई लोगों से पूछना पड़ता था या इंटरनेट पर अलग-अलग जगह जानकारी तलाशनी पड़ती थी, उसका शुरुआती जवाब अब कुछ सेकंड में मिल जाता है।

सुविधा है तो सावधानी भी जरूरी

एआई की यही आसानी कई बार उसे भरोसेमंद सलाहकार की भूमिका में ले आती है। जब किसी सवाल का जवाब तुरंत और पूरे आत्मविश्वास से मिलता है तो स्वाभाविक तौर पर उस पर भरोसा भी बढ़ सकता है, लेकिन हर जवाब सही हो, यह जरूरी नहीं। तुषार धवन भी एआई को सहायक की तरह इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। उनके अनुसार, महत्वपूर्ण जानकारी को खुद सत्यापित करना, निजी जानकारी की सुरक्षा का ध्यान रखना और महत्वपूर्ण फैसलों में अपने विवेक का इस्तेमाल करना जरूरी है यानी एआई से विकल्प पूछना अलग बात है और उसके बताए विकल्प को अंतिम फैसला मान लेना अलग। रेसिपी या वीडियो के टापिक में गलती का असर कम हो सकता है, लेकिन स्वास्थ्य, पैसे, कानूनी मामलों या रिश्तों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में सिर्फ एआई के जवाब पर निर्भर होना सही नहीं होगा।

अब मन की बात भी एआई से

एआई का इस्तेमाल अब सिर्फ रोजमर्रा के काम आसान करने तक सीमित नहीं है। कुछ महिलाएं इससे अपने मन की उलझनें भी साझा करने लगी हैं। किसी रिश्ते को लेकर परेशानी हो, मन में कोई बात चल रही हो या अकेलापन महसूस हो रहा हो, तो एआई से बातचीत करना आसान लगता है। सामने कोई व्यक्ति नहीं होता, इसलिए अपनी बात कहने में संकोच भी कम होता है। मनोचिकित्सक डा. रुपाली शिवालकर के अनुसार, अकेलापन आज केवल भारत की समस्या नहीं है। ऐसे में एआई कुछ लोगों के लिए बातचीत का माध्यम बन रहा है। महिलाओं के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारे समाज में अपनी परेशानियों, खासकर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बातों को खुलकर कहना अब भी आसान नहीं होता।उन्हें जज किए जाने, बात फैलने या अपनी निजता को लेकर चिंता हो सकती है। ऐसे में एआई से बातचीत करना उन्हें अपेक्षाकृत आसान लगता है।

डॉ. रुपाली कहती हैं कि कुछ महिलाएं एआई से इलाज कराने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए बात करती हैं क्योंकि उन्हें बातचीत के लिए एक साथी मिल जाता है। एआई मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सामान्य जानकारी देने या अपनी बात कहने के लिए एक ‘साउंडिंग बोर्ड’ की तरह मदद कर सकता है। कुछ मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े एआई प्लेटफार्म सीबीटी जैसी तकनीकों का भी इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, एआई इंसान नहीं है और न ही वह मानवीय रिश्ते का विकल्प हो सकता है।

डॉ. रुपाली के अनुसार, एआई से बातचीत करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसके साथ साझा की गई निजी जानकारी की निजता और गोपनीयता को लेकर वैसी गारंटी नहीं होती, जैसी किसी पेशेवर से परामर्श के दौरान होती है। इसलिए तकनीक के फायदे जरूर हैं, लेकिन उसका इस्तेमाल सोच-समझकर और संतुलित तरीके से किया जाना चाहिए।

सहानुभूति के जवाब में असली भावना नहीं

यही वह जगह है जहां एआई और इंसानी सहेली के बीच सबसे बड़ा अंतर सामने आता है। एआई आपकी बात के शब्दों और संदर्भ के आधार पर संवेदनशील जवाब तैयार कर सकता है। जवाब पढ़ या सुनकर आपको लग सकता है कि सामने वाला आपकी परेशानी समझ रहा है, लेकिन क्या वह वास्तव में आपकी भावना महसूस कर रहा है?

रिलेशनशिप एक्सपर्ट डॉ. निशा खन्ना कहती हैं, ‘एआई किसी जवाब का भावनात्मक और सहानुभूतिपूर्ण उत्तर तैयार कर सकता है, लेकिन अगर वह खुद उन भावनाओं और सहानुभूति को महसूस नहीं कर रहा है तो यह वास्तविक भावना नहीं होगी। सामने वाला इंसान इस अंतर को महसूस कर सकता है। जब आप किसी व्यक्ति से फोन पर या आमने-सामने बात करते हैं तो उसकी आवाज, व्यवहार और भावनाओं में होने वाले बदलाव महसूस होते हैं। एआई के साथ बातचीत में इस तरह के व्यवहारगत बदलाव नहीं मिलते। इसलिए एआई का जवाब भले ही बहुत भावनात्मक या सहानुभूतिपूर्ण लगे, लेकिन वह मानवीय जुड़ाव का विकल्प नहीं हो सकता।’ एआई आपको जवाब दे सकता है, लेकिन वह आपके साथ उस भावना को जी नहीं रहा होता। यही फर्क उसे सहेली बनने से रोकता है।

कहीं आदत न बन जाए़

एआई से बात करने में आसानी और तुरंत जवाब मिलने की सुविधा धीरे-धीरे आदत भी बन सकती है। डा. रुपाली के अनुसार, अगर अकेलेपन से बचने के लिए कोई व्यक्ति लगातार एआई का सहारा लेने लगे और वास्तविक लोगों से बातचीत कम करने लगे तो इसका उलटा असर हो सकता है। मानवीय संपर्क से दूरी व्यक्ति को और अकेला कर सकती है। निमहंस में मनोचिकित्सक डॉ. अनामिका साहू हर बात में एआई के उपयोग पर चेताती हैं। वह कहती हैं, ‘एआई का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल एक आदत या व्यवहारगत लत का रूप भी ले सकता है। इसलिए जहां इंसानी बातचीत संभव है, वहां इंसानी बातचीत को प्राथमिकता देना बेहतर है। तकनीक की मदद वहां ली जा सकती है, जहां वह वास्तव में उपयोगी है।’

सहेली रहे, फैसला लेने वाली नहीं

एआई से दूरी बनाने की जरूरत नहीं है। सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह महिलाओं के लिए उपयोगी साथी साबित हो सकता है। वह जानकारी जुटाने, नए आइडिया देने और कई रोजमर्रा के काम आसान करने में मदद कर सकता है, लेकिन उसकी भूमिका एक सहायक तक ही रहे तो बेहतर है। सारिका की तरह हर छोटी-बड़ी बात पूछना सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन अंतिम फैसला अपना होना चाहिए। खासकर स्वास्थ्य, पैसे, रिश्तों या जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में एआई के जवाब को अंतिम सच मानने के बजाय अपनी समझ और अनुभव को महत्व देना जरूरी है।

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