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इंसानी दिमाग की काबिलियत को चुपचाप घटा रहा है AI, वैज्ञानिकों ने बताया इसे 'एपिस्टेमिक रिस्क'

Published: Mon, 15 Jun 2026 01:01 PM (IST)

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारे काम करने, सीखने और फैसले लेने के तरीकों को तेजी से बदल रहा है।

AI पर अंधाधुंध निर्भरता से सिकुड़ रही हैं सोचने-समझने की क्षमता (Image Source: AI-Generated)

AI पर अंधाधुंध निर्भरता से सिकुड़ रही हैं सोचने-समझने की क्षमता (Image Source: AI-Generated)

HighLights

  1. एआई हमारी सोचने और तर्क करने की क्षमता घटा रहा है

  2. वैज्ञानिकों ने इसे "एपिस्टेमिक रिस्क" नाम दिया है

  3. एआई पर निर्भरता से दिमाग की मांसपेशियां कमजोर हो रही हैं

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। जब भी AI से जुड़े खतरों की बात होती है, तो लोगों को अक्सर नौकरियां जाने या हॉलीवुड फिल्मों जैसे 'किलर रोबोट्स' का ख्याल आता है, लेकिन हाल ही में, शोधकर्ताओं ने एक ऐसे खतरे की ओर इशारा किया है जो बिना शोर मचाए हम पर हावी हो रहा है। जी हां, हमारी स्वतंत्र रूप से सोचने, तर्क करने और सही फैसले लेने की क्षमता का धीरे-धीरे कम होना।

AI dependence dangers

(Image Source: AI-Generated)

समाज के लिए एक नई चुनौती

ऑक्सफोर्ड, एमआईटी, कॉर्नेल और कार्नेगी मेलन जैसी दुनिया की जानी-मानी यूनिवर्सिटीज के 30 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने एक नई रिसर्च पब्लिश की है। उन्होंने इस नए खतरे को "एपिस्टेमिक रिस्क" का नाम दिया है।

इसका सीधा-सा मतलब यह है कि अगर इंसान सही और गलत की पहचान करने या तार्किक रूप से सोचने की अपनी सामूहिक क्षमता खो देगा, तो वैज्ञानिक विकास, लोकतंत्र और खुद एआई को संभालना मुश्किल हो जाएगा। वैज्ञानिक मानते हैं कि एआई पर हमारी बढ़ती अंधाधुंध निर्भरता हमारी इसी बुनियादी नीव पर प्रहार कर रही है।

दिमाग पर चढ़ा 'प्लास्टर'

रिसर्च के मुताबिक, जैसे-जैसे हम लिखने, डेटा खंगालने या फैसले लेने के लिए एआई पर निर्भर हो रहे हैं, वैसे-वैसे हमारी खुद की दिमागी काबिलियत घट रही है। रिपोर्ट में इसे एक बेहतरीन उदाहरण से समझाया गया है:

अगर आप अपने हाथ पर लंबे समय तक प्लास्टर बांधे रखें, तो काम न करने के कारण अंदर की मांसपेशियां सिकुड़ कर कमजोर हो जाती हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि एआई भी हमारे दिमाग के लिए उसी प्लास्टर की तरह बन गया है, जिसे हम खुशी-खुशी और अपनी मर्जी से दिन-रात पहने हुए हैं।

शोध में सामने आए चौंकाने वाले फैक्ट्स

वैज्ञानिकों की इस चेतावनी के पीछे हवा-हवाई बातें नहीं, बल्कि ठोस सबूत मौजूद हैं:

  • कोडिंग में सुस्ती: जिन सॉफ्टवेयर डेवलपर्स ने एआई की मदद से काम किया, उनमें गलतियां ढूंढने और उन्हें ठीक करने की क्षमता उन लोगों से कम पाई गई जिन्होंने बिना एआई के अपनी मेहनत से काम किया था।
  • दिमाग का कम इस्तेमाल: एआई की मदद से लिखने वाले लोगों के ब्रेन स्कैन से पता चला कि उनके दिमाग में सामान्य इंटरनेट सर्च करने वालों के मुकाबले काफी कम हलचल हो रही थी।
  • पूरी तरह काम सौंपने की आदत: चैटबॉट्स के साथ की गई लाखों बातचीत के विश्लेषण से पता चला कि लोग एआई को अपना 'सहयोगी' मानने के बजाय, अपना पूरा काम उसी पर छोड़ते जा रहे हैं।

Impact of AI on human cognition

(Image Source: AI-Generated)

स्टूडेंट्स को हो रहा सबसे ज्यादा नुकसान

इस ट्रेंड का सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों को हो रहा है। रिसर्च में देखा गया कि जिन छात्रों को लिखने में दिक्कत होती है, वे अपना दिमाग लगाने के बजाय एआई के जवाबों की हूबहू नकल करने लगे हैं। वहीं, जो छात्र पहले से ही पढ़ाई में तेज हैं, वे इसका इस्तेमाल सिर्फ एक टूल के रूप में कर रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि होशियार और कमजोर छात्रों के बीच का फासला कम होने की बजाय और अधिक चौड़ा होता जा रहा है।

'खतरनाक लूप' जो खत्म कर रहा इंसानी सोच

रिसर्च में एआई की "जी हुजूरी" करने की आदत पर भी गंभीर चिंता जताई गई है। एआई मॉडल्स को इस तरह से बनाया और ट्रेन किया जाता है कि वे यूजर को खुश रखें। ऐसे में, वे यूजर की गलत बातों या मान्यताओं पर सवाल उठाने के बजाय, बस उसमें 'हां में हां' मिलाते हैं।

इंटरनेट पर एआई द्वारा तैयार किया गया कंटेंट बड़ी तेजी से भरता जा रहा है। जब भविष्य के एआई मॉडल इसी कंटेंट को पढ़कर सीखेंगे, तो मशीनों का मशीनों से सीखने का एक लूप बन जाएगा। इससे दुनिया में विचारों, नजरियों और अभिव्यक्ति की विविधता खत्म होने का डर है।

तकनीकी कंपनियां भी यही चाहती हैं कि यूजर्स पूरी तरह से उनके एआई सिस्टम के आदी हो जाएं और उन पर निर्भर रहें, क्योंकि इसी में उनका व्यापारिक हित छिपा है।

वैज्ञानिकों ने बताए 3 रास्ते

इन तमाम चिंताओं और चेतावनियों के बावजूद, वैज्ञानिकों का यह बिल्कुल नहीं कहना है कि एआई के विकास को रोक देना चाहिए। इसके बजाय, वे इन 3 समाधानों पर जोर देते हैं:

  • जिम्मेदार डिजाइन: एआई सिस्टम्स को ज्यादा समझदारी से डिजाइन किया जाए ताकि वे इंसानी सोच को चुनौती दे सकें, न कि सिर्फ चापलूसी करें।
  • शिक्षा में बदलाव: शिक्षा प्रणाली में ऐसे तरीके अपनाए जाएं जो इंसानों की 'तर्क करने की शक्ति' को मजबूत करें।
  • तत्काल एक्शन: एआई से होने वाले इन मानसिक और सामाजिक खतरों पर तुरंत ध्यान देकर जरूरी कदम उठाए जाएं, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।

Source: AI Epistemic Risks: Emerging Mechanisms & Evidence

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