क्या हार्ट अटैक आने से पहले ही मिल जाएगा अलर्ट, AI कैसे बदल रहा है दिल की बीमारियों का इलाज?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने स्वाथ्य देखभाल के क्षेत्र में बेशुमार उम्मीदें पैदा की हैं, लेकिन यह भी सच है कि तकनीक कभी भी डॉक्टर की जगह नहीं ले सकती।

दिल की बीमारियों का पता लगाने में एआई मददगार (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दिल हमेशा से मानव जीवन के केंद्र में रहा है। यह जीवन को लय देने और अस्तित्व को बनाए रखने के साथ गहरी संवेदनाओं से भी जुड़ा है। फिर भी, हाइपरटेंशन, डायबिटीज, मोटापा, उच्च कोलेस्ट्राल, धूमपान, तनाव और शिथिलता भरी जीवनशैली के चलते भारत में लाखों लोगों के दिल पर खतरा मंडरा रहा है।
ऐसे वक्त में जब कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के चलते सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट बढ़ रहा है, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) स्वास्थ्य देखभाल में एक भरोसेमंद सहयोगी बन रहा है। 'क्या एआई कार्डियोलाजी बदल सकता है?' इससे अधिक अहम सवाल है कि क्या एआई हार्ट की बीमारियों से बचाने, लोगों तक सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने और भारतीयों को हार्ट की बेहतर देखभाल सुनिश्चित कराने में सहायक हो सकता है? आइए जानें डॉ. एच. के. चोपड़ा (चीफ कार्डियोलाजिस्ट, मेदांता मूलचंद हार्ट इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली) से।
बीमारियों की जांच से खतरों के अनुमान तक
दशकों से चिकित्सा प्रतिक्रियाशील रही है, यानी बीमारी होने के बाद ही उसका इलाज किया जाता है, लेकिन एआई हार्टकेयर में पूर्व अनुमान से लेकर बचाव तक एक नई संभावना दिखा रहा है। आधुनिक एआई सिस्टम बड़े स्तर पर क्लीनिकल जानकारियों का विश्लेषण कर सकते हैं, खासकर ईसीजी, इकोकार्डियोग्राम, कार्डिएक इमेजिंग, लैब रिजल्ट और अन्य हेल्थ डाटा में इनकी बहुत उपयोगिता है।
एआई उस पैटर्न को पहचान सकता है, जो इंसानों के लिए दुश्कर है। कार्डियोवैस्कुलर समस्याओं की शुरुआती पहचान और उच्च जोखिम वाले व्यक्ति को चिह्नित करने में एआई चिकित्सकों की मदद कर सकता है। यह भारत के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि भारत में ऐसे कार्डियोवैस्कुलर जोखिम वालों की संख्या बहुत है, जिनके वर्षों तक लक्षण नहीं दिखते।
हार्टकेयर का भविष्य उससे आगे बढ़ना चाहिए, जैसे आज हार्ट में क्या महसूस हो रहा है? कल क्या होने की आशंका है और उसे रोकने के लिए आज क्या कर सकते हैं? एआई ने प्रश्नों का हल दे सकता है। साथ ही चिकित्सकीय विशेषज्ञता को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंचाने में सक्षम है।
भारत में स्वास्थ्य देखभाल की सबसे बड़ी चुनौती केवल मेडिकल पेशेवरों की कमी ही नहीं है, बल्कि विशेषज्ञों तक पहुंच असामान्य स्थिति है। विश्वस्तरीय कार्डिएक सुविधाएं बड़े शहरों तक ही सीमित हैं, जबकि ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में लोग समय पर सही उपचार की सुविधा से वंचित हैं। एआई आधारित ईसीजी जांच, पोर्टेबल इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफी, डिजिटल हेल्थ प्लेटफार्म और प्वाइंट आफ केयर टेक्नोलाजी से फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मी भी उन मरीजों की पहचान कर सकते हैं, जिन्हें तत्काल विशेषज्ञ जांच की जरूरत है। अगर एआई का जिम्मेदारी भरा प्रयोग हो तो यह मेडिकल विशेषज्ञता दूरदराज के मरीज तक उपलब्ध करा सकती है। यही एआई का वास्तविक सामाजिक मूल्य भी है।
कार्डियोलाजिस्ट की जगह नहीं लेगा एआई
एक धारणा बन रही है कि एआई डॉक्टरों की जगह ले लेगा, लेकिन यहां समझने की जरूरत है कि चिकित्सा केवल पैटर्न की पहचान तक सीमित नहीं है। एक एल्गोरिदम कार्डियोवैस्कुलर खतरों का अनुमान लगा सकता है, लेकिन डाक्टर मरीज के परिवार, उसके हालात, उम्मीदों और भय को भी समझ सकता है।
एआई उपचार में मदद कर सकता है, लेकिन वास्तविक सहानुभूति, आश्वासन और नैतिक जिम्मेदारी का निर्वहन केवल इंसान ही कर सकता है, इसलिए भविष्य डॉक्टर बनाम एआई नहीं, बल्कि डॉक्टर+एआई+मानवीय करुणा होना चाहिए।
एआई का प्रयोग क्लीनिकल को-पायलट की तरह होना चाहिए, जो जानकारियों को समझने, पैटर्न को चिह्नित करने और सही निर्णय लेने में डॉक्टरों की सहायता करे। इससे मरीज की देखभाल समुचित ढंग से और अधिक पेशेवर ढंग से हो पाएगी।
महत्वपूर्ण है हर मिनट
तीव्र हृदयाघात की स्थिति में सबसे बड़ी ताकत है- समय। एआई आधारित सिस्टम ईसीजी में संभावित समस्या, उच्चतर जोखिम को प्राथमिकता और इमरजेंसी विभागों, कार्डियोलाजिस्ट और कार्डिएक इंटरवेंशन टीम के बीच तेज कम्युनिकेशन को सुगम बनाने में मदद कर सकता है।
इसी तरह यह सिस्टम एरिथिमिया (अनियमित हृदय गति), हार्ट फेलियर और दिल से जुड़ी अन्य बीमारियों का जल्दी पता लगाने में मददगार हो सकता है। तकनीक से कभी इमरजेंसी इलाज में देरी नहीं होनी चाहिए। अचानक सीने में दर्द, सांस लेने में कठिनाई, पसीना आने, बेहोशी अन्य गंभीर लक्षणों में मरीज को तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए, चाहे एआई सिस्टम उपलब्ध हो या नहीं।
व्यक्तिगत देखभाल की सुविधा
संभवत: इससे सबसे रोमांचक उम्मीद व्यक्तिगत दिल से जुड़ी समस्या की रोकथाम है। एक ही आयु वर्ग के लोगों में जरूरी नहीं कि एक जैसी ही हार्ट समस्या हो। उनके ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, कोलेस्ट्राल, फैमिली हिस्ट्री, जीवनशैली, नींद और शारीरिक सक्रियता और अन्य करणों में भी काफी भिन्नता हो सकती है।
एआई इन मानकों के आधार पर डाक्टर की मदद कर सकता है, ताकि वे मरीज की स्थिति का सही आकलन कर जरूरी इलाज कर सकें। यह हार्ट केयर को 'बीमारी का इलाज करने' वाले मॉडल से बदलकर 'खतरे का अनुमान लगाने, बीमारी को रोकने और सेहत बनाए रखने' वाले माडल में बदल सकता है, लेकिन व्यापक प्रयोग से पहले एआई पर भरोसा किया जाना जरूरी है।
सुविधाजनक होने के साथ साथ एआई का जिम्मेदारी भरा प्रयोग भी उतना ही अहम है। भारत अद्भुत विविधताओं का देश है। किसी अन्य आबादी के डाटा के आधार पर तैयार एल्गोरिदम को भारतीयों के लिए प्रयोग करना उपयुक्त नहीं है।
हमें भारतीय डाटा सेट, भारतीय सत्यापन व्यवस्था और भारतीय चिकित्सकीय साक्ष्य की जरूरत है। मरीज की निजता को भी सुरक्षित करना होगा। स्वास्थ्य जानकारियां बेहद निजी होती हैं, इन्हें एकत्रित और प्रयोग करने में मजबूत सुरक्षा उपाय होने चाहिए। एआई सिस्टम की सटीकता, पक्षपात और सुरक्षा के लिए लगातार निगरानी तंत्र होना आवश्यक है।
सबसे जरूरी है कि डॉक्टरों को एआई की सीमाओं को समझना चाहिए। एक भरोसेमंद एल्गोरिदम भी गलत हो सकता है, इसलिए एआई का प्रयोग डॉक्टरों की मदद के लिए होना चाहिए, न कि उनके विकल्प के रूप में।
स्वास्थ्य असमानता का कारण न बने तकनीक
भारत की एआई क्रांति समावेशी होनी चाहिए। अगर एआई आधारित एडवांस हार्टकेयर केवल प्रभावशाली शहरी आबादी तक सीमित रहेगा, तो इससे स्वास्थ्य देखभाल की खाईं चौड़ी होती जाएगी। एआई का लक्ष्य इसके विपरीत हो।
एआई का प्रयोग प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में होना चाहिए, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाने, जिला अस्पतालों और पिछड़े क्षेत्रों के लोगों को स्पेशलिस्ट से जुड़ने की सुविधा देने वाले सिस्टम के तौर पर होना चाहिए। एआई की सफलता को टेक्नोलाजी की जटिलता से नहीं, बल्कि बेहतर बनी और बचाई गई जिंदगियों की संख्या से मापा जाना चाहिए।
इंसानी दिल को केंद्र में रखना जरूरी
सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि मशीनें बहुत अधिक समझदार हो जाएंगी, बल्कि खतरा यह है कि इंसान उन पर बहुत ज्यादा निर्भर हो सकते हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में इंसानियत कभी खत्म नहीं होनी चाहिए। भविष्य का कार्डियोलाजिस्ट हजारों डाटा प्वाइंट्स का विश्लेषण करने के लिए एआई का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन उसे फिर भी मरीज की आंखों में देखना होगा।
भविष्य के अस्पतालों में हर जगह स्मार्ट मशीनें हो सकती हैं, लेकिन मरीज को तब भी दया और संवेदना की जरूरत होगी। भविष्य का हेल्थकेयर सिस्टम भले ही पूरी तरह डिजिटल हो जाए, लेकिन भरोसा हमेशा इंसानी ही रहेगा। भारत के पास अब एआई-आधारित हार्टकेयर का ऐसा माडल बनाने का मौका है जो इनोवेशन के साथ नैतिकता, टेक्नोलाजी के साथ किफायतीपन, इंटेलिजेंस के साथ समझदारी और कुशलता के साथ संवेदना का गठजोड़ बनाता हो।
एक स्वस्थ दिल से एक स्वस्थ व्यक्ति बनता है। स्वस्थ व्यक्ति स्वस्थ परिवार बनाते हैं। स्वस्थ परिवार एक स्वस्थ समाज में योगदान देते हैं और स्वस्थ नागरिक ही स्वस्थ भारत, मजबूत भारत और विकसित भारत की नींव होते हैं। एआई हमें जल्दी पता लगाने, तेजी से कदम उठाने और बेहतर तरीके से बचाव करने में मदद कर सकता है।
आखिरकार, हेल्थकेयर में सबसे जरूरी इंटेलिजेंस आर्टिफिशियल नहीं होती। यह देखभाल करने की इंसानी समझदारी है, क्योंकि हार्टकेयर का भविष्य भले ही एआई से चले, लेकिन उसका दिल इंसानी ही रहना चाहिए।
