दिमाग का 'व्हाइट मैटर' क्या होता है? क्यों इसके बिना काम करना बंद कर सकता है आपका ब्रेन
यूके के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, दिमाग के व्हाइट मैटर को नुकसान अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है।

वैज्ञानिकों ने खोजा दिमाग की बीमारियों के पीछे छिपा ये गहरा राज (Image Source: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
प्रेट्र, नई दिल्ली। हमारा दिमाग मुख्य रूप से दो हिस्सों से मिलकर काम करता है- 'ग्रे मैटर' और 'व्हाइट मैटर'। यूके के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन ने दिमागी बीमारियों को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस शोध के अनुसार, दिमाग के 'व्हाइट मैटर' में होने वाला नुकसान अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के लक्षण पैदा कर सकता है।

(Image Source: Freepik)
क्या है व्हाइट और ग्रे मैटर का कनेक्शन?
हमारे दिमाग की बाहरी परत को ग्रे मैटर कहा जाता है। यह दिमाग का मुख्य 'प्रोसेसिंग हब' है, जहां हमारी सोचने-समझने की प्रक्रिया होती है। वहीं, व्हाइट मैटर एक 'इंफॉर्मेशन हाईवे' की तरह काम करता है, जो ग्रे मैटर को जोड़ता है।
अध्ययन से पता चला है कि अगर इस 'इंफॉर्मेशन हाईवे' यानी व्हाइट मैटर को नुकसान पहुंचता है, तो ग्रे मैटर में सूजन आ सकती है। इसके परिणामस्वरूप इंसान की सोचने-समझने और याद रखने की क्षमता में गिरावट आ सकती है।
मायलिन को नुकसान और उसका असर
व्हाइट मैटर का सबसे प्रमुख हिस्सा 'मायलिन' होता है, जो नसों को सुरक्षित रखने वाली एक परत है। मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी ऑटोइम्यून बीमारियों में हमारा प्रतिरक्षा तंत्र इसी परत को नष्ट करने लगता है।
शोधकर्ताओं ने प्रयोग के दौरान दिमाग के एक सर्किट में मायलिन को थोड़ा सा नुकसान पहुंचाया और इसके परिणामों पर नजर रखी। उन्होंने पाया कि:
- मायलिन के इस छोटे से नुकसान ने दूर स्थित ग्रे मैटर वाले हिस्सों में भी हलचल पैदा कर दी।
- दिमाग की प्रतिरक्षा कोशिकाएं, जिन्हें माइक्रोग्लिया कहा जाता है, सक्रिय हो गईं।
- इसके कारण न्यूरॉन्स के बीच का आपसी संपर्क टूट गया।

(Image Source: Freepik)
हमेशा बुरी नहीं होती दिमाग की सूजन
इस रिसर्च ने एक बहुत पुरानी धारणा को भी चुनौती दी है कि दिमाग में सूजन हमेशा हानिकारक ही होती है।
अध्ययन में देखा गया कि जब मायलिन परत दोबारा बनने लगी, तो न्यूरॉन्स के बीच का संपर्क भी फिर से जुड़ गया और सूजन अपने आप शांत हो गई। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जब वैज्ञानिकों ने दवाइयों से इस सूजन को रोकने की कोशिश की, तो मायलिन के दोबारा बनने की प्रक्रिया में भी रुकावट आ गई।
इसका सीधा मतलब यह है कि यह अस्थायी सूजन असल में दिमाग की 'मरम्मत प्रक्रिया' का एक बेहद जरूरी हिस्सा है। हालांकि, अगर मायलिन के बनने की प्रक्रिया को पूरी तरह रोक दिया जाए, तो यह प्रतिक्रिया खत्म होने के बजाय एक स्थायी या पुरानी समस्या बन जाती है।
इलाज की एक नई दिशा
अब तक चिकित्सा जगत में अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों का मुख्य कारण केवल ग्रे मैटर में होने वाले बदलावों को ही माना जाता था, लेकिन इस नए अध्ययन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों का सफल इलाज करने के लिए डॉक्टरों को केवल ग्रे मैटर पर नहीं, बल्कि व्हाइट मैटर के नुकसान को ठीक करने पर भी विशेष ध्यान देना होगा।
