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न दर्द, न कोई परेशानी, फिर भी टूट सकती है हड्डी; ऑस्टियोपोरोसिस को क्यों कहते हैं साइलेंट बीमारी?

By Dr. Ramkinkar JhaEdited By: Shweta Chauhan
Published: Mon, 19 Oct 2026 04:04 PM (IST)

ऑस्टियोपोरोसिस एक 'साइलेंट बीमारी' है, जो बिना किसी स्पष्ट लक्षण के हड्डियों को कमजोर करती है।

ऑस्टियोपोरोसिस में नहीं दिखाई देते लक्षण (Image Source: AI Generated)

ऑस्टियोपोरोसिस में नहीं दिखाई देते लक्षण (Image Source: AI Generated)

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समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। डॉक्टर ऑस्टियोपोरोसिस को एक साइलेंट बीमारी कहते हैं और यह नाम इसपर सटीक भी बैठता है। हड्डियां समय के साथ अपनी मजबूती खोने लगती हैं और इसमें सबसे चिंता की बात यह है कि इसके कोई लक्षण भी नहीं दिखते। 

आप ठीक से चल रहे होते हैं, अंदर से ठीक से महसूस करते हैं और दिन भी सामान्य जा रहा होता है। फिर एक दिन जब अचानक से हल्का सा पैर फिसलता है और हड्डी टूट जाती है, तो हम समझ नहीं पाते कि ऐसा क्यों हुआ। यहीं पर हमें गौर करने की जरूरत है कि कहीं न कहीं हमारी हड्डियां सालों से संघर्ष कर रही थीं। 

ऑस्टियोपोरोसिस में नहीं दिखाई देते लक्षण 

ऑस्टियोपोरोसिस की बीमारी में यही सबसे बड़ी परेशानी है कि आपको मांसपेशियों में खिंचाव या जोड़ों में चोट तो महसूस होती है, पर कमजोर होती हड्डियों का पता नहीं चल पाता। 

मेरे एक मरीज का मामला भी इसी से जुड़ा हुआ है। उनकी उम्र 70 साल थी और उन्हें कमर दर्द की परेशानी थी, यह दर्द इतना भयंकर था कि न तो वो ठीक से बैठ पाती थीं और न ही खड़ी हो पाती थीं। स्कैन किया गया तो पता चला कि ऑस्टियोपोरोसिस के चलते उनकी रीढ़ की निचली हड्डी पूरी तरह से डैमेज हो चुकी थी। फिर उन्हें ऐसे कोई लक्षण भी नहीं दिखाई दिए, जिसकी पहचान की जाए। 

ऑस्टियोपोरोसिस के लक्षण क्यों नहीं पता चलते? 

हड्डियां लिविंग टिशू होती हैं, ये लगातार टूटकर बनती रहती हैं। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, पुरानी हड्डियों के टूटकर बनने की यह प्रक्रिया धीमी पड़ने लगती है। अब जितनी नई हड्डियां बन रही हैं, उससे कहीं ज्यादा पुरानी हड्डियां टूटने लगती हैं। यही ऑस्टियोपोरोसिस है जिसमें हड्डियों का घनत्व और गुणवत्ता इतनी कम हो जाती है कि मामूली सी चोट में भी हड्डी टूट सकती है।

उम्र बढ़ने के साथ यह जोखिम भी बढ़ जाता है, खासकर महिलाओं में मेनोपॉज के बाद यह समस्या देखने को मिलती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस दौरान एस्ट्रोजन का लेवल बढ़ जाता है और हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। बता दें कि मेनोपॉज के अलावा भी ऐसी बहुत सी बीमारियां, पोषक तत्वों की कमी, लंबे समय से स्टेरॉयड दवाइयां लेना या फैमिली हिस्ट्री भी इसके लिए जिम्मेदार है। 

विटामिन डी-3 की कमी भी एक वजह 

कई बार किसी मरीज की रूटीन स्क्रीनिंग में मैं देखता हूं कि किसी युवा का विटामिन डी-3 बहुत कम है। अब क्योंकि विटामिन-डी शरीर में कैल्शियम को अवशोषित करने में मदद करता है, ऐसे में इसकी कमी शरीर पर बड़ा प्रभाव दिखा सकती है, जिसे डाइट, धूप और हड्डियों के निर्माण से जुड़ी आदतों से ठीक करना जरूरी है। 

4 संकेत कि हड्डियां पहले से हैं बहुत नाजुक 

  1. मामूली सी चोट से फ्रैक्चर हो जाना, इसमें कलाई, कूल्हे और रीढ़ की हड्डी पर फ्रैक्चर का जोखिम सबसे ज्यादा रहता है। 

  2. कद छोटा होना सिर्फ बुढ़ापे से जुड़ा हुआ नहीं है, इसका संबंध हमारी कमजोर हड्डियों से भी है। डॉक्टर को बताएं अगर लंबाई 2 से.मी. से कम हो गई है। इसके लिए साल में एक बार जरूर लंबाई की जांच करें। 

  • पोस्चर में बदलाव भी एक संकेत है, जिसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। अचानक से झुककर चलना या कूबड़ निकल जाना, खासकर अगर ये बदलाव लंबाई कम होने के साथ हुआ हो। 

  • कमर में दर्द उठना भी एक संकेत है। ऑस्टियोपोरोसिस वैसे दर्दनाक नहीं होता, लेकिन वर्टेब्रा यानी रीढ़ की निचली हड्डी में फ्रैक्चर हो जाए तो कमर दर्द बढ़ जाता है। 

  • जोखिम कारक कौन से हैं? 

    • ऑस्टियोपोरोसिस की फैमिली हिस्ट्री या हिप फ्रैक्चर

    • उम्र से पहले मेनोपॉज 

    • वजन कम होना

    • स्मोकिंग 

    • ज्यादा शराब का सेवन 

    • कैल्शियम की कमी 

    • लंबे समय तक कॉर्टिकोस्टेरॉइड दवाओं का सेवन 

    • थाइरॉइड समस्या 

    • न्यूट्रिएंट्स एब्जॉर्प्शन में बाधा डालने वाली कोई स्थिति 

    किसे हड्डियों की जांच करानी चाहिए? 

    आमतौर पर 65 साल या उससे ज्यादा उम्र की महिलाओं को इसकी जांच करानी चाहिए। इसके अलावा, पुरुष जिनकी उम्र 70 साल या उससे ज्यादा है उन्हें जांच की सलाह दी जाती है। इसके अलावा, फ्रैक्चर, मेनोपॉज जैसी स्थिति में भी डॉक्टर टेस्ट की सलाह दे सकते हैं। 

    कैसे रखें हड्डियों का ख्याल? 

    • संतुलित आहार लें जिसमें कैल्शियम और प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा हो 

    • विटामिन डी की कमी सप्लीमेंट्स के जरिए पूरी करें 

    • रोजाना पैदल चलें और धूप भी लें

    • बिना फिसलने वाले मैट और पायदान उपयोग करें 

    • स्मोकिंग और शराब के सेवन से परहेज करें 

    (डॉ. रामकिंकर झा, सीके बिड़ला अस्पताल, गुरुग्राम में रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट एंड ऑर्थोपेडिक्स विभाग में सीनियर ऑर्थोपेडिक सर्जन और डायरेक्टर हैं)