दोपहर में ज्यादा सुस्ती और नींद आना आलस नहीं, हो सकती है एक बीमारी! वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाला इसका तोड़
यह नया शोध नार्कोलेप्सी से पीड़ित व्यक्तियों के लिए नई उम्मीद बनकर आया है।

दोपहर की नींद नार्कोलेप्सी का संकेत (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दोपहर के समय सोना कुछ लोगों की आदत में होता है, आपने आसपास कई लोग दिन में सोते नजर आते होंगे। अगर यह किसी थकान की वजह से है तो अलग बात है लेकिन कई लोगों को आप देखते होंगे कि ऐसा अक्सर उनके साथ होता है। हम समझते हैं कि यह एक आम आदत है, जिसके चलते दिन में उन्हें नींद आ रही है। जबकि इसके पीछे की वजह कुछ और भी हो सकती है, जिसके बारे में हाल ही की एक स्टडी ने खुलासा किया है।
नार्कोलेप्सी की समस्या के शिकार
इस स्टडी के मुताबिक, इस तरह के लोग नार्कोलेप्सी की समस्या के शिकार हो सकते हैं। उन्हें दिनभर नींद आती रहती है और मांसपेशियों में कमजोरी भी महसूस हो सकती है। ऐसे लोगों के लिए एक नई दवा बड़ी लाभदायक पाई गई है। इसका नाम ओर्जेफुल है। यह दवा मस्तिष्क में पाए जाने वाले एक आवश्यक पेप्टाइड, ओरेक्सिन की नकल करने की खोज में लंबे समय से प्रतीक्षित सफलता है। बताते चलें कि यह पेप्टाइड टाइप-1 नार्कोलेप्सी से पीड़ित लोगों में अनुपस्थित होता है।
शख्स को जगाए रखने का हुआ परीक्षण
अमेरिका में 120,000 लोग इस प्रकार की नार्कोलेप्सी से पीड़ित हैं, जिससे अत्यधिक नींद आना और कैटाप्लेक्सी के दौरे पड़ते हैं। नार्कोलेप्सी के उपचारों के परीक्षण के समय शख्स को जगाए रखने का परीक्षण किया गया। इस दौरान व्यक्ति को 40 मिनट के लिए एक मंद रोशनी वाले कमरे में बैठाया गया। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के डॉ. इमैनुअल मिग्नोट ने कहा, "आपको जागते रहना होगा। आप पढ़ नहीं सकते, टीवी नहीं देख सकते, बात नहीं कर सकते। एक सामान्य व्यक्ति के लिए भी यह मुश्किल होता है। नार्कोलेप्सी से पीड़ित व्यक्ति के लिए यह असंभव है।"
दवा के दिखे सकारात्मक परिणाम
उपचार से पहले मरीज चार से पांच मिनट के भीतर सो जाते थे। दो अंतिम चरण के परीक्षणों में 16 से 70 वर्ष की आयु के 300 रोगियों को 12 सप्ताह तक या तो ओर्जेफुल या प्लेसीबो दिया गया। एक अन्य शोधकर्ता डॉ. थामस स्कैमेल के अनुसार, ओर्जेफुल लेने पर वे 20 मिनट से अधिक समय तक जाग सकते थे, जो वर्तमान में उपलब्ध दवाओं की तुलना में लगभग दोगुना है। इस तरह देखा जाए तो नार्कोलेप्सी की बीमारी में उपचार के लिए यह बेहद सकारात्मक परिणाम है।
