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क्या जन्म से ही लड़के और लड़कियों की पसंद अलग होती है? साइंस ने दिया इस सवाल का हैरान करने वाला जवाब

Published: Wed, 23 Sep 2026 08:21 AM (IST)

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एक शोध में सामने आया है कि नवजात बच्चियां इंसानी चेहरों को देखने में ज्यादा समय बिताती हैं, जबकि लड़के चीजों को पसंद करते हैं।

नवजात शिशु सबसे ज्यादा किसे देखना पसंद करते हैं? (Picture Courtesy: Freepik)

नवजात शिशु सबसे ज्यादा किसे देखना पसंद करते हैं? (Picture Courtesy: Freepik)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या नवजात शिशुओं की भी अपनी पसंद होती है? वो किस चीज को देखते हैं ये उनकी पसंद होती है या सिर्फ नई दुनिया को देखने की उत्सुकता? ब्रिटेन के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने एक दिलचस्प स्टडी की, जिसमें इन सवालों के हैरान करने वाले जवाब सामने आए हैं।  

दरअसल, इस रिसर्च के मुताबिक, नवजात बच्चियां अपना ज्यादा समय इंसानी चेहरों को देखने में बिताती हैं, जबकि नवजात लड़के चीजों को देखना ज्यादा पसंद करते हैं। सुनकर थोड़ी हैरान तो होती है कि नवजात शिशुओं की पसंद में ये अंतर कैसे आया, लेकिन इस स्टडी में इसका कारण भी साफ हो गया है। आइए जानें क्या कहती है ये स्टडी।  

कैसे हुई ये स्टडी?

बायोलॉजी ऑफ सेक्स डिफरेंसेस जर्नल में पब्लिश हुई इस स्टडी में 130 नवजात शिशुओं को शामिल किया गया। इस स्टडी के लिए रिसर्चर्स ने नवजात बच्चों के सामने दो तरह के वीडियो एक साथ चलाए। एक वीडियो में स्वाभाविक गतिविधियों वाला इंसानी चेहरा था और दूसरे वीडियो में ग्रैविटेशन और मकैनिकल प्रॉपर्टीज के कारण हवा में झूलती हुई मेटल की गेंदें थीं। 

इस स्टडी के नतीजे

इस स्टडी में पाया गया है कि लिंग से परे हटकर सामान्य तौर पर सभी नवजात शिशुओं ने इंसानी चेहरे को देखना ज्यादा पसंद किया। हालांकि, जब देखने के समय का विश्लेषण किया गया, तो नवजात बच्चियों ने नवजात लड़कों की तुलना में इंसानी चेहरे को देखने में ज्यादा समय बिताया। 

बायोलॉजी से जुड़े हैं कारण

नवजात शिशुओं की पसंद में ये अंतर जन्म के कुछ ही घंटों बाद देखा गया। इसलिए रिसर्चर्स मानते हैं कि अपब्रिंगिंग और सोशल एक्सपीरिएंस शुरू होने से पहले ही प्रेग्नेंसी के दौरान दोनों लिंगों के बीच हार्मोनल लेवल और जेनेटिक्स जैसे प्रीनेटल बायोलॉजिकल फैक्टर्स इस व्यवहार के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। 

ऑटिज्म रिसर्च सेंटर के असिस्टेंट रिसर्च प्रोफेसर एलेक्स त्सोमपेनिडिस ने साफ किया कि जन्म के समय दिखने वाले लिंग आधारित अंतर सिर्फ शुरुआती पॉइन्ट हैं। ये इस बात को पूरी तरह से तय नहीं करते कि बच्चे जीवन में आगे कैसे सीखते या विकसित होते हैं। बायोलॉजिकल और सोशल फैक्टर्स हमेशा एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, जिससे इंसानों के स्वभाव में अंतर बना रहता है।