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सिर्फ चर्बी नहीं, वजन घटाने वाली दवाएं सीधे दिमाग पर कर रही हैं असर; नई रिसर्च में हुआ डरावना खुलासा

Published: Fri, 08 May 2026 02:51 PM (IST)

क्या आप वजन कम करने के लिए नई दवाओं का इस्तेमाल करने की सोच रहे हैं? तो आपको यह जानना ...और पढ़ें

पतले होने की चाहत में कहीं दिमाग पर तो नहीं हो रहा गहरा असर? (Image Source: AI-Generated)

पतले होने की चाहत में कहीं दिमाग पर तो नहीं हो रहा गहरा असर? (Image Source: AI-Generated) 

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप भी बिना ज्यादा मेहनत किए वजन कम करने के लिए नई दवाओं का सहारा लेने की सोच रहे हैं? अगर हां, तो ठहरिए। हाल ही में हुई एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि मुंह से ली जाने वाली मोटापे की नई दवाएं सिर्फ आपकी भूख नहीं मिटातीं, बल्कि ये आपके दिमाग के उस हिस्से को भी बदल सकती हैं जो आपको किसी चीज से खुशी, प्रेरणा या मजा आने का अहसास कराता है।

डायबिटीज की दवा से वजन कम करने तक का सफर

'जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट' नाम की ये दवाएं मूल रूप से टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों के लिए बनाई गई थीं, ताकि उनके शरीर में इंसुलिन सही से काम कर सके। वजन कम होना इसका एक 'साइड बेनिफिट' था। पहले वैज्ञानिकों को लगता था कि ये दवाएं सिर्फ हमारी खोपड़ी के निचले हिस्से पर असर करती हैं, जिससे पेट भरा-भरा लगता है या उल्टी जैसा महसूस होता है, लेकिन अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के शोधकर्ताओं ने चूहों पर किए गए प्रयोगों से एक नया और बड़ा खुलासा किया है।

Weight loss drug side effects

(Image Source: AI-Generated) 

दिमाग की गहराइयों तक पहुंच रही हैं नई दवाएं

रिसर्च बताती है कि डैनुग्लिप्रॉन और ओरफोर्ग्लीप्रॉन जैसी हाल ही में मंजूर की गई नई ओरल दवाएं दिमाग के काफी गहरे हिस्सों तक घुसपैठ कर रही हैं।

ये दवाएं दिमाग के निचले हिस्से को एक नए रास्ते के जरिए सीधे 'सेंट्रल एमिग्डाला' (दिमाग का भावनाओं को प्रोसेस करने वाला केंद्र) और खुशी देने वाले 'डोपामाइन' हार्मोन बनाने वाले न्यूरॉन्स से जोड़ देती हैं। यही वह पूरा तंत्र है जो यह तय करता है कि ज्यादा कैलोरी वाले स्वादिष्ट खाने या किसी भी मजेदार चीज से हमें कितनी खुशी मिलेगी।

भूख नहीं, स्वादिष्ट खाने की 'लालसा' खत्म करती हैं ये दवाएं

इस रिसर्च के मुख्य शोधकर्ता और न्यूरोसाइंटिस्ट अली डी. गुलर ने इसे बहुत ही आसान शब्दों में समझाया है। उनका कहना है कि "हम जो दिखा रहे हैं वह यह है कि ये दवाएं सिर्फ भूख कम नहीं करतीं, बल्कि ये उस स्वादिष्ट केक को पाने की आपकी इच्छा को ही मार देती हैं। ये आपके उस सिस्टम पर काम कर रही हैं जो आपको केक के लिए ललचाता है, न कि सिर्फ उस सिस्टम पर जो आपको पेट भरे होने का अहसास कराता है।"

मशहूर विज्ञान पत्रिका 'नेचर' में प्रकाशित इस अध्ययन से यह भी साफ हो जाता है कि क्यों कुछ वजन घटाने वाली दवाओं से लोगों का बहुत ज्यादा जी मिचलाता है, जबकि इस श्रेणी की कुछ नई दवाएं बिना किसी शारीरिक तकलीफ के सीधा दिमाग को ऐसा बना देती हैं कि खाने का मन ही नहीं करता।

क्या जिंदगी का मजा हो जाएगा कम?

आज के समय में फार्मा कंपनियां इन्जेक्शन वाली दवाओं के बजाय मुंह से खाई जाने वाली गोलियां बनाने पर जोर दे रही हैं क्योंकि इन्हें बनाना आसान और सस्ता है, और ये जल्दी खराब भी नहीं होतीं। इससे दुनिया के करोड़ों लोगों तक ये दवाएं आसानी से पहुंच सकती हैं।

लेकिन शोधकर्ताओं ने एक बड़ी चेतावनी भी दी है। अगर ये दवाएं दिमाग के 'रिवॉर्ड सिस्टम पर असर कर रही हैं, तो इसके नतीजे वजन घटने से कहीं आगे तक जा सकते हैं। इंसानों के व्यवहार पर इसका गहरा असर पड़ सकता है:

  • संभावित फायदे: शुरुआती सबूत बताते हैं कि कुछ लोगों को सिगरेट जैसी बुरी लत या बिना सोचे-समझे बहुत ज्यादा खाने की आदत पर काबू पाने में आसानी हो सकती है। यह लत छुड़ाने के इलाज में एक बड़ा कदम हो सकता है।
  • संभावित नुकसान: वहीं दूसरी तरफ, कुछ लोगों को ऐसा महसूस हो सकता है कि उनकी जिंदगी से चीजों का मजा या खुशी ही कम हो गई है। इसका असर व्यक्ति के खुद पर नियंत्रण और आनंद लेने की क्षमता पर पड़ सकता है।

गुलर का स्पष्ट रूप से मानना है कि ये दवाएं बहुत ही शक्तिशाली हैं। जैसे-जैसे आम लोग रोजमर्रा की जिंदगी में इनका इस्तेमाल शुरू करेंगे, इन पर बहुत कड़ी निगरानी रखने की जरूरत होगी ताकि हम पूरी तरह समझ सकें कि हमारे शरीर और दिमाग पर इनका क्या असर हो रहा है।

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