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न दवा, न कोई महंगा डाइट प्लान: सिर्फ दाल-सब्जी और भारतीय मसालों के दम पर पाएं लोहे जैसी तंदुरुस्ती

Published: Sun, 04 Oct 2026 10:04 AM (IST)

दालें, सब्जियां और मसाले शरीर को स्वस्थ और प्रसन्न रखते हैं, और यह पारंपरिक भोजन आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान से भी आगे है।

शाकाहारी थाली किसी चमत्कार से कम नहीं (Image Source: AI Generated)

शाकाहारी थाली किसी चमत्कार से कम नहीं (Image Source: AI Generated)

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समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। मैं एक राधास्वामी घर में बड़ा हुआ। मेरे पिता का परिवार उत्तर प्रदेश में लखनऊ और उसके आस-पास विस्तृत था। मेरी दादी लखनऊ की थीं और दादा कानपुर के थे। मां का परिवार लाहौर से शिमला और फिर दिल्ली आया। इन अलग-अलग शहरों और संस्कृतियों की सुगंध हमारे घर में बसी थी, लेकिन एक बात बिल्कुल साफ थी। घर में सब कुछ शाकाहारी पकता था। 

मेरे दादाजी भगत सरन भटनागर पक्के राधास्वामी थे। तब वनस्पति-प्रधान भोजन, सजग खान-पान और स्वच्छ जीवन जैसे शब्दों का चलन नहीं था। यह किसी स्वास्थ्य योजना का हिस्सा भी नहीं था। यह आस्था का अनुशासन, घर का नियम और जीने का ढंग था। आज विज्ञान हमें वनस्पतियों से भरपूर भोजन और मदिरा से दूरी के लाभ समझा रहा है। मैं सोचता हूं, किसे पता था कि मेरे दादाजी अपने सादे-से घर में समय से कितना आगे चल रहे थे! जिन बातों को संसार आज शोध के माध्यम से समझ रहा है, हमारे बुजुर्ग उन्हें परंपरा, अनुभव और शरीर की सहज समझ के सहारे जी रहे थे। 

मांसाहार रोज की जिंदगी का केंद्र नहीं

सेहत का वह संदेश मैं 35 वर्ष की आयु तक शाकाहारी रहा। फिर मुझे लगा कि एक संपूर्ण रसोइया बनने के लिए मांस को चखना, समझना और पकाना आवश्यक है। शायद पाक-कला के प्रति वह अधिक सम्मान था, लेकिन अपने शरीर के प्रति कुछ कम। आज भी मांस का कोई स्वादिष्ट व्यंजन सामने हो, तो मैं मना नहीं करता, लेकिन यह मेरी रोज की जिंदगी का केंद्र नहीं है।

मेरा शरीर बार-बार मुझे एक ही संदेश देता है। मुझे सब्जी खिलाओ। जब मैं शाकाहारी भोजन खाता हूं, शरीर हल्का, प्रसन्न और संतुष्ट रहता है। मांस खाने के बाद कभी दो-तीन दिनों तक दर्द, भारीपन और सूजन महसूस होती है। बहुत समय तक मुझे लगा कि ऐसा केवल मेरे साथ होता है। अब समझ में आता है कि बहुत से लोग अपने शरीर में ऐसे ही बदलाव अनुभव करते हैं। हर शरीर की प्रकृति अलग होती है; मेरा शरीर अपनी पसंद बिल्कुल साफ भाषा में बता देता है।

तिजोरी से ज्यादा रत्न थाली में 

रोज मेरी थाली में दालें, फलियां, साबुत अनाज, सब्जियां और सलाद होते हैं। चावल बहुत कम; रोटी भी कभी-कभार। मेरी असली भूख रंगों की है। पालक का हरा, कद्दू का पीला, चुकंदर का लाल, बैंगन का जामुनी; करेले की कड़वाहट, इमली की खटास और टमाटर की मिठास। प्रकृति ने सब्जी मंडी को ऐसा रंगमहल बनाया है, जिसके सामने किसी जौहरी की तिजोरी भी फीकी लगे। 

शाकाहारी भोजन एक चमत्कार 

मेरे पिता को उच्च रक्तचाप था और बचपन से मेरा रक्तचाप भी ऊंचा रहा, इसलिए हृदय की सेहत मेरे लिए समाचार-पत्र में छपा कोई परामर्श नहीं, अपने जीवन का गंभीर प्रश्न है। जब मेरे हृदयरोग विशेषज्ञ जांच के परिणाम देखते हैं, तो वे मुझे अच्छे हृदय स्वास्थ्य का आदर्श उदाहरण कहते हैं। चमत्कार है हमारा भोजन भारत में शाकाहारी होना कोई कठिनाई नहीं, बहुत बड़ी सहजता है, क्योंकि हम सब्ज़ी पकाना जानते हैं। 

हम फूलगोभी को केवल उबालते नहीं; उसे सेंकते, भूनते और मसालों से जगाते हैं। दाल को निर्धन का भोजन कहकर छोड़ते नहीं; हींग, जीरे, लहसुन और घी का छौंक लगाकर उसे घर की सुगंध बना देते हैं। हमारी रसोइयों में जिमीकंद के कोफ्ते हैं, भरवां करेले और भरवां टिंडे हैं; सूखी सब्जियां, साग, कढ़ी, खिचड़ी और दालों का अंतहीन संसार है। हर ऋतु अपनी टोकरी लेकर आती है और हर क्षेत्र अपना स्वाद। यह भोजन कमी का नहीं, चमत्कार का संसार है। मेरा करारी भिंडी का सलाद इसी विश्वास से जन्मा। 

भिंडी को गोल काटने के बजाय लंबी, पतली धारियों में काटा, उसे करारा किया, फिर प्याज, टमाटर, धनिया, अमचूर और गरम मसाले से मिलाया। फूड एंड वाइन ने अपने 40 वर्षों में प्रकाशित 24 हजार से अधिक व्यंजन-विधियों में से जिन 40 सर्वश्रेष्ठ व्यंजनों को चुना, उनमें मेरा करारी भिंडी का सलाद भी था। दक्षिण एशिया का प्रतिनिधित्व एक भिंडी ने किया! एक साधारण समझी जाने वाली सब्जी संसार के विशाल भोज पर सिर उठाकर बैठी थी। 

भोजन भी सत्य की खोज

गांधीजी ने किशोरावस्था में छिपकर मांस चखने के अपने अनुभव और उससे उपजी बेचैनी के विषय में लिखा। इंग्लैंड में वे शाकाहारी भोजनालय खोजते फिरे। वही शाकाहार उनके लिए विवशता से आगे बढ़कर सोच-समझकर किया गया नैतिक चुनाव बना। उनका जीवन बताता है कि भोजन भी मनुष्य की सत्य की खोज बन सकता है। तो अपने शाकाहारी मित्रों-पाठकों से मेरी भी एक विनती है। 


मांस खाने वालों को अपनी मेज से बाहर मत कीजिए। उन्हें बुलाइए। ऐसी दाल पकाइए जो स्मृति बन जाए, ऐसी गोभी जो बातचीत रोक दे, ऐसी भिंडी जो दिल चुरा ले। उपदेश से पहले निवाला दीजिए। हर निवाले के साथ उस किसान को याद कीजिए, जो धूप, धूल, वर्षा और बेचैन मौसमों के बीच हमारे लिए अन्न उगाता है। हमारी थाली का हर रंग उसके हाथों की मेहनत है; हर दाना उसका आशीर्वाद। अपने शरीर का आभार मानिए, धरती का ऋण पहचानिए और उन हाथों को प्रणाम कीजिए, जो मिट्टी से हमारे लिए जीवन उगाते हैं!

विदेशी मेज की शान है हमारा भोजन

आज न्यूयार्क, लंदन, पेरिस और कोपनहेगन में शाकाहारी भोजन आधुनिक, आकर्षक और विलासपूर्ण माना जा

रहा है। दुख यह है कि भारत में हम कभी-कभी उसी भोजन को कमतर समझते हैं, क्योंकि वह हमें घर की याद दिलाता है। घर का भोजन हमें मामूली लगता है। विदेशी मेज पर वही चीज सज जाए, तो आधुनिक हो जाती है। विश्व के उत्कृष्ट भोजन जगत में भारत को अपनी असली जगह तब मिलेगी, जब हम अपने घरों की रसोइयों को सम्मान देना सीखेंगे। जब हम समझेंगे कि स्वास्थ्यवर्धक, मौसमी, क्षेत्रीय, शाकाहारी और वनस्पति-प्रधान भोजन कोई समझौता नहीं, हमारी सबसे बड़ी संपदा है।

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(लेखक: मिशेलिन स्टार शेफ सुवीर सरन, लखनऊ)