बिहार की पहचान कैसे बना 52 परतों वाला ‘टके सेर खाजा’? नालंदा और भगवान बुद्ध से जुड़ी कहानी है 200 साल पुरानी
बिहार का प्रसिद्ध सिलाव खाजा, अपनी 52 परतों और लाजवाब स्वाद के लिए जाना जाता है।

सिलाव का खाजा को पहले कहते थे खजूरी (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आपने भारतेन्दु हरिश्चंद्र के प्रसिद्ध नाटक अंधेर नगरी चौपट राजा की यह पंक्ति कई बार सुनी होगी ‘टके सेर भाजी टके सेर खाजा’। इस पंक्ति में जिस खाजा का नाम है, आज हम उसी सिलाव के खाजा के इतिहास पर बात करने वाले हैं।
बिहार के पारंपरिक पकवानों में हम अक्सर ठेकुआ और लिट्टी चोखा का ही नाम लेते हैं, जबकि यहां बहुत से और व्यंजन हैं जिनका अपना समृद्ध इतिहास है। इन्हीं में से एक मिठाई सिलाव का खाजा है, जिसके लाजवाब स्वाद ने इसे दुनियाभर में पहचान दिलाई है।
सिलाव का खाजा को पहले कहते थे खजूरी
बिहार के नालंदा से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर सिलाव नामक गांव है, यहीं से इस मिठाई का नाम ‘सिलाव का खाजा’ रखा गया। कहते हैं 52 परतों वाली इस खाजा मिठाई को आज से 200 साल पहले बाशिेंदे काली साह ने पहली बार बनाया था।
उस समय इसे खाजा नहीं, बल्कि खजूरी नाम से लोग जानते थे। आज भी काली साह की इस मिठाई की विरासत को उनकी पीढ़ी ने संजोकर रखा है। सिलाव में उनकी करीब 6 दुकानें हैं और इन दुकानों की यह स्वादिष्ट मिठाई दुनियाभर में अपना नाम बना चुकी है। इसकी लोकप्रियता को देखते हुए ही इसे साल 2018 में जीआई टैग दिया गया।
कैसे बनी थी यह मिठाई?
सिलाव के खाजा को पहली बार घर में ही पिसे हुए गेहूं के मैदा, शुद्ध देसी घी और चीनी से तैयार किया गया था। उस दौर में इस मशहूर मिठाई की कीमत मात्र एक पैसे सेर खाजा हुआ करती थी। आज देखिए यह मिठाई बिहार के एक छोटे से कस्बे से निकलकर अमेरिका,दुबई, लंदन, पाकिस्तान और स्पेन तक भी ऑनलाइन बिक रही है।
भगवान बुद्ध ने चखा था खाजा का स्वाद
स्थानीय लोककथाएं कहती हैं कि तत्कालीन नालंदा विश्वविद्यालय के प्राचार्य शीलभद्र ने स्वागत के समय इस मिठाई को भगवान बुद्ध को खाने के लिए दिया था। इसका स्वाद चखने के बाद भगवान बुद्ध का एक ही सवाल था कि यह क्या है? तो इसके जवाब में शीलभद्र ने कहा था ‘खाजा’। कहते हैं तब से ही इस मिठाई को खाजा कहा जाने लगा।
मौर्य और गुप्तकाल के यात्रियों का खास खाना
कहा यह भी जाता है कि मौर्य और गुप्तकाल में यात्री सफर के समय खाजा ले जाना पसंद करते थे। इसकी सबसे बड़ी वजह थी इस मिठाई की शेल्फ लाइफ। खाजा कई दिनों तक खराब नहीं होता था और इससे भूख भी मिट जाती थी।
