गुलगुले जैसा था कभी डोनट, फिर क्यों बीच में कर दिया गया छेद? 175 साल पुराने एक तूफान से जुड़ी है इसकी कहानी
भारतीय गुलगुले से मिलते-जुलते डोनट का इतिहास सदियों पुराना है, जिसकी शुरुआत डच प्रवासियों के 'ओली कोएकेन' से हुई।

डोनट्स के बीच में भरे जाते थे मेवे और फल (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय रसोइयों में आटे और चीनी को मिलाकर जहां मीठे पुए या गुलगुले बनाए जाते हैं, तो पश्चिमी देशों में आटे में मिठास डालकर बनाया गया डोनट भी इसी का एक विदेशी रूप है। हां, वो बात अलग है कि इनकी रेसिपी में थोड़ा बहुत बुनियादी अंतर है।
पर क्या आप पहली बार डोनट बनाए जाने की कहानी जानते हैं? क्या आपको पता है कि इसमें छेद करके एक छल्ले की तरह ही क्यों बनाया जाता है? चलिए आज डोनट्स के दिलचस्प इतिहास पर बात करते हैं।
सदियों से आटे को तलकर खाने की परंपरा
भारत में ही नहीं दुनियाभर में आटे को तेल में फ्राई करके खाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसके प्रमाण अमेरिका के ऐतिहासिक काल में भी देखने को मिले। इसके अलावा, रोमन और ग्रीक संस्कृति में भी आटे को तलकर उसमें मिठास डालकर खाया जाता रहा।
अगर हम डोनट्स के इतिहास पर नजर डालें तो यह हमें न्यूयॉर्क में 17वीं और 18वीं सदी में आए डच प्रवासियों के समय में देखने को मिलता है। कहा जाता है कि डचों ने ही पहली बार 'ओली कोएकेन' और 'ओलीकोएक्स' नाम से डोनट्स बनाए थे। इन शब्दों का हिन्दी मतलब ‘ऑयल केक’ होता है।
डोनट्स के बीच में भरे जाते थे मेवे और फल
यहां जान लेने वाली बात यह है कि पहले के समय में डोनट्स में छेद करके छल्लों की तरह नहीं बनाया जाता था। इन स्वीट बॉल्स के बीच में मेवे और फ्रूट्स छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर भरे जाते थे। यह तरीका डोनट को बीच से जल्दी पकने में मदद करता था।
इन्हें रिंग की तरह बनाना किसी आविष्कार से कम नहीं
कहते हैं कि साल 1850 के आसपास हेन्सन ग्रेगरी नाम के किसी अमेरिकी नाविक ने डोनट्स बीच में छेद कर उसे एक छल्ले की तरह बनाया था। हालांकि, इस कहानी का कोई प्रमाण नहीं है और इसे सुनी-सुनाई बात या लोककथा माना जाता है।
वहीं, इससे जुड़ी दूसरी कहानी भी है कि एक बार जब हेन्सन ग्रेगरी डोनट्स खाते हुए भयंकर तूफान के बीच जहाज को संभाल रहे थे, तब उन्होंने अपने हाथ खाली करने के लिए डोनट को पहिए की लकड़ी में चुभो दिया। इस तरह रिंग वाले डोनट का आविष्कार हुआ।
पहले वर्ल्ड वॉर से भी रहा खास नाता
पहले विश्व युद्ध का इतिहास पढ़ें तो हम पाते हैं कि उस दौरान सैनिक जमीन के अंदर गहरी खाइयों में महीनों तक रहकर लड़ते थे। उस समय डोनट्स उनकी भूख मिटाने में मददगार साबित हुआ। कहा यह भी जाता है कि युद्ध में लड़ रहे सैनिकों को ये डोनट्स महिला वॉलंटियर्स लाकर परोसती थीं। इसी वजह से उन महिलाओं को "डोनट लैसीज" भी कहा जाता था।
वैसे तो इन महिलाओं ने पाई और केक बनाने की प्लानिंग कर रखी थी, लेकिन मुश्किल परिस्थितियों में सारी सामग्री उपलब्ध न होने के कारण डोनट्स बनाने का ऑप्शन चुना गया। ऐसा इसलिए क्योंकि इन्हें बनाने के लिए तेल, आटे और जैसी बहुत ही कम सामग्री की जरूरत पड़ती थी।
