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आधे चांद जैसी करंजी के बिना अधूरी है महाराष्ट्र-गुजरात की दीवाली, फराल थाली से जुड़ी है सदियों पुरानी परंपरा

Published: Sun, 08 Nov 2026 07:00 AM (IST)

दीवाली पर उत्तर भारत में गुझिया की तरह, पश्चिमी और दक्षिण भारत में करंजी बनाने की परंपरा है।

दीवाली पर गुझिया उर्फ करंजी बनाए जाने की परंपरा (Image Source: AI Generated)

दीवाली पर गुझिया उर्फ करंजी बनाए जाने की परंपरा (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दीवाली पर मिठाई की बात हो और उसमें हम गुझिया का जिक्र न करें, ऐसा कैसे हो सकता है। अब आप सोच रहे होंगे कि गुझिया तो होली पर बनती हैं, फिर दीवाली से इसका क्या कनेक्शन; तो बता दें कि भारत के कुछ राज्य ऐसे हैं, जहां दीवाली के मौके पर विशेष रूप से गुझिया बनाए जाने की परंपरा है। 

चलिए आज आपका परिचय गुझिया के इसी अलग रूप से करवाते हुए इस परंपरा के बारे में विस्तार से बताते हैं। 

दीवाली पर गुझिया उर्फ करंजी बनाए जाने की परंपरा 

जहां एक तरफ उत्तर भारत में होली पर गुझिया बनाई जाती हैं, तो वहीं दूसरी तरफ पश्चिमी और दक्षिण भारत  में दीवाली वो खास अवसर होता है, जब करंजी बनाए जाने की परंपरा है। इनमें खासतौर से महाराष्ट्र और कर्नाटक के साथ ही अन्य राज्यों में गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्य शामिल हैं। 

कैसे पड़ा करंजी नाम? 

करंजी नाम इस मिठाई की बनावट के चलते दिया गया है। अब क्योंकि इसका आकार आधे चांद जैसा होता है, ऐसे में इसका नाम भी इसी से प्रेरित है। वहीं, भारत में एक करंज नाम का पेड़ भी है, जिसपर लगने वाली फलियों और बीज का आकार अर्द्धचंद्र की तरह होता है। इसी वजह से माना जाता है कि इस फल के इस आकार को देखकर ही मिठाई का भी नाम करंजी रख दिया गया। 

महाराष्ट्र-गुजरात के फराल से है मिठाई का खास कनेक्शन 

दीवाली पर सभी नमकीन और मीठे व्यंजन एक दूसरे को बांटकर त्योहार मनाते हैं। महाराष्ट्र और गुजरात में इसी परंपरा को फराल कहा जाता है। इस दिन घर में नमकीन और मीठे व्यंजनों की थाली तैयार की जाती है, जिसमें खासतौर से करंजी को शामिल किया जाता है। घर के सभी सदस्य नरक चतुर्दशी के दिन स्नान कर नए कपड़े पहनते हैं। उसके बाद सभी साथ में बैठकर इन व्यंजनों का स्वाद लेते हैं। इसके अलावा, मेहमाननवाजी में भी इन स्नैक्स को रखने की परंपरा है। 

ऐसा भी कहा जाता है कि फराल के स्नैक्स 1-2 महीनों तक खराब नहीं होते। इस दौरान मौसम भी बदल रहा होता है, जिसमें हल्के मीठे-नमकीन स्नैक्स ऊर्जा भी देते हैं और मौसम के हिसाब से शरीर को ढलने में भी मदद करते हैं। फिर इन्हें कहीं भी घूमते-फिरते हुए हाथ में लेकर आसानी से खाया भी जा सकता है। 

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