शरद पूर्णिमा पर पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड में निभाई जाती है टेसू-झांझी की परंपरा, महाभारत से जुड़ी है कहानी
इस आर्टिकल में आपको पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में शरद पूर्णिमा पर निभाई जाने वाली टेसू-झांझी विवाह परंपरा से जुड़ी कुछ खास बातें जानने को मिलेंगी।

शरद पूर्णिमा की रात क्यों सजती है टेसू की बारात? (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बचपन में हम सभी ने गुड्डे-गुड़ियों की शादी का खेल जरूर खेला होगा, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे कोई ऐतिहासिक और प्रेम की महान गाथा भी हो सकती है?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड के इलाकों में सर्दियों की दस्तक के साथ ही एक बेहद अद्भुत परंपरा देखने को मिलती है, जिसे 'टेसू और झांझी का विवाह' कहा जाता है। आइए आपको बताते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात को होने वाली इस अनोखी शादी की पूरी कहानी क्या है।
कैसे सजती है टेसू की बारात?
सितंबर-अक्टूबर के महीने में जब आसमान साफ होने लगता है और हल्की-हल्की ठंड का एहसास शुरू होता है, तब किशोर उम्र के लड़के-लड़कियां इस उत्सव में डूब जाते हैं। दशहरे और नवरात्र के आस-पास ही इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
लड़कों की एक टोली कई तरह के रंग-बिरंगे कपड़ों को जोड़कर एक गुड्डा बनाती है। इस गुड्डे को एकदम दूल्हे की तरह सजाया जाता है और नाम दिया जाता है 'टेसू'। इसके बाद लड़के इस टेसू को लेकर गली-गली जाते हैं, नाचते-गाते हैं और खुशी-खुशी चंदा इकट्ठा करते हैं। फिर वो लड़कियों को संदेश भेजते हैं कि अपनी 'झांझी' को तैयार रखना, शरद पूर्णिमा के दिन बारात आएगी।
दूसरी तरफ, लड़कियां भी अपनी गुड़िया यानी 'झांझी' को एक सुंदर दुल्हन का रूप देती हैं और उसके साथ एक हल्की रोशनी वाला दीया भी रखती हैं। फिर शरद पूर्णिमा की उस खूबसूरत रात में, जब पूरा चांद आसमान में खिला होता है, पूरे उत्साह के साथ टेसू और झांझी का विवाह संपन्न कराया जाता है।
महाभारत से जुड़ा है टेसू का रहस्य
इस अनोखे खेल के तार असल में महाभारत काल के एक महान योद्धा के बलिदान से जुड़े हैं। माना जाता है कि जिसे बच्चे 'टेसू' कहकर बुलाते हैं, वो कोई और नहीं बल्कि महाबली भीम के पोते और घटोत्कच के पुत्र 'बर्बरीक' हैं।
बर्बरीक इतने शक्तिशाली थे कि वे अकेले ही महाभारत का युद्ध खत्म कर सकते थे। उनके पास अग्नि देव का दिया हुआ एक अजेय धनुष और भगवान शिव के दिए गए तीन चमत्कारी बाण थे। बर्बरीक ने अपनी मां को वचन दिया था कि वह युद्ध में हमेशा उसी का साथ देंगे, जो हार रहा होगा।
भगवान श्रीकृष्ण यह बात भली-भांति जानते थे कि अगर बर्बरीक ने पांडवों की तरफ से युद्ध किया, तो कौरव हारने लगेंगे। ऐसे में अपना वचन निभाने के लिए बर्बरीक कौरवों के पाले में चले जाएंगे। इस अदला-बदली में अंततः सिर्फ और सिर्फ विनाश होगा।
श्रीकृष्ण ने मांगा शीश का दान
युद्ध का यह भयानक परिणाम रोकने के लिए भगवान कृष्ण ने ब्राह्मण का रूप लिया और बर्बरीक से उनका सिर दान में मांग लिया। बर्बरीक तुरंत राजी हो गए, लेकिन उन्होंने दो अंतिम इच्छाएं जताईं- पहली, वह महाभारत का पूरा युद्ध अपनी आंखों से देखना चाहते थे और दूसरी, वह झांझी से शादी करना चाहते थे।
उनके बलिदान को स्वीकार करते हुए, श्रीकृष्ण ने उनका कटा हुआ सिर कुरुक्षेत्र की एक ऊंची पहाड़ी पर तीन डंडों के सहारे रख दिया, ताकि वे युद्ध देख सकें। यही कारण है कि आज भी बच्चे टेसू के गुड्डे का सिर एक तिपाये पर ही बनाते हैं। वहीं, उनकी दूसरी इच्छा का मान रखने के लिए हर साल शरद पूर्णिमा पर झांझी के साथ उनकी प्रतीकात्मक शादी कराई जाती है। हालांकि, बर्बरीक का नाम टेसू कैसे पड़ा, इस राज पर से कभी परदा नहीं उठ सका है।
बुंदेलखंड की 800 साल पुरानी वीरगाथा
महाभारत की कहानी के अलावा, बुंदेलखंड में एक और किस्सा काफी सुनाया जाता है। यह लोककथा लगभग 700-800 साल पुरानी है। इसके अनुसार, टेसू एक कबीले के मुखिया का बेटा था। जिस दिन टेसू की शादी होने वाली थी और बारात निकल रही थी, तभी किसी बाहरी हमलावर ने उनके कबीले पर धावा बोल दिया।
बिना एक पल गंवाए, टेसू अपनी बारात छोड़कर मैदान-ए-जंग में उतर गया। उसने दुश्मनों को धूल तो चटा दी और अपने कबीले को बचा लिया, लेकिन इस भीषण युद्ध में वह बुरी तरह जख्मी हो गया और अंततः उसने अपने प्राणों की आहुति दे दी।
धुंधली होती एक सुनहरी याद
आज के दौर में, जहां शहरीकरण और मोबाइल की दुनिया ने बच्चों को घरों में कैद कर दिया है, वहीं टेसू-झांझी का यह उल्लास भरा त्योहार धीरे-धीरे विलुप्त हो रहा है। इसके बावजूद, आगरा, मथुरा, अलीगढ़, इटावा, कानपुर, कासगंज, औरैया और बुंदेलखंड के कई हिस्सों में लोग आज भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। यह सिर्फ एक शादी का खेल नहीं है, बल्कि प्रेम, साहस और निस्वार्थ बलिदान की वो गाथा है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचना ही चाहिए।
