ल्यादो रे बादीला ढोला... जिस लहरिया पर मरती हैं राजस्थानी महिलाएं, वो था पुरुषों की शान; राजपूतों से है नाता
लहरिया राजस्थान की संस्कृति का अहम हिस्सा है, लेकिन शुरुआत में इसे महिलाओं के लिए नहीं बनाया गया था।

राजस्थानी महिलाओं के शृंगार का हिस्सा है लहरिया (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने राजस्थानी गाना ‘अरे ल्यादो रे बादीला ढोला लहरियो सा’ सुना है? इस गाने में महिला अपने पति से लहरिया लाने के लिए कह रही है। इस गाने से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि राजस्थानी महिलाओं के लिए लहरिया कितना अहम है, लेकिन क्या आप जानते हैं इसे पहले महिलाओं के लिए नहीं बनाया गया था?
जी हां, जो लहरिया आज राजस्थानी के शृंगार का हिस्सा बन चुका है, वो असल में महिलाओं के लिए बनाया ही नहीं गया था। आइए जानें क्या है लहरिया की कहानी।
राजपूती राजाओं की शान
लहरिया का इतिहास राजस्थान के शाही परिवार से जुड़ा है। आज भले ही हम साड़ियों और दुपट्टों पर लहरिया प्रिंट देखते हैं, लेकिन शुरुआत में इसे राजपूती राजाओं की पगड़ी के लिए बनाया गया था। युद्ध के मैदान और राज दरबार में वीरता, मर्यादा और अपनी पहचान के प्रतीक की तरह राजा-महाराजा अलग-अलग रंगों वाले लहरिया साफे पहना करते थे।
समय के साथ इस कला का विस्तार हुआ और कपड़ों पर इसके आकर्षक डिजाइन और महीन कारीगरी ने धीरे-धीरे इसे महिलाओं के पहनावे का हिस्सा बनाया और राजस्थानी पोशाक, साड़ियों और दुपट्टे पर लहरिया ने अपनी जगह बनाई।
रेगिस्तान की लहरों से नाता
लहरिया शब्द सुनकर ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये लहरों से बना है। थार के रेगिस्तान में जब तेज हवाएं चलती हैं, तो रेत के ऊपर लहरदार आकृतियां बन जाती हैं। लहरिया डिजाइन रेत की इन्हीं लहरों से बनाया गया है।
कपड़ों पर लहरिया बनाने के लिए टाई एंड डाई तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। कपड़े को खास तरीके से मोड़कर बांधा जाता है और फिर अलग-अलग रंगों से रंगा जाता है। जब कपड़ा खुलता है, तो उस पर रंग-बिरंगी तिरछी रेखाएं बनी होती हैं। मोठड़ा भी लहरिया का एक खास रूप है, जिसमें रेखाएं एक-दूसरे को काटती रहती हैं और जालीदार डिजाइन बनाती है।
राजस्थान की संस्कृति का हिस्सा
राजस्थान में सावन के महीने के स्वागत के लिए गाए जाने वाले गीतों में लहरिया की खास जगह है। तीज त्योहार के मौके पर भी शादीशुदा महिलाएं रंग-बिरंगा लहरिया वाला लहंगा या पोशाक पहनती हैं। लहरिया के रंगों के जरिए सावन आने की खुशी को बयां किया जाता है।
राजस्थानी लोकगीत ‘अरे ल्यादो रे बादीला ढोला लहरियो सा’ में भी महिला अपने पति या प्रेमी से कह रही है कि सावन आ गया है, मेरे लिए लहरिया ला दो। लहरिया आज राजस्थानी महिलाओं के पहनावे का अहम हिस्सा बन चुका है।
