मसाले ही नहीं, रंगों का भी बादशाह रहा है भारत... यहीं की मिट्टी से दुनिया को मिले ये 6 खूबसूरत रंग
आज के दौर में केमिकल वाले रंग बहुत आम बात हैं, लेकिन क्या आपने कभी उस समय की कल्पना की ...और पढ़ें

भारतीय मिट्टी से निकले 6 बेमिसाल रंग, जिन्होंने बदल दी दुनिया की रंगत (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है कि जब कारखानों में सिंथेटिक रंग नहीं बनते थे, तब इस दुनिया में रंग किसने भरे? जी हां, वो हमारा भारत ही था, जिसने सदियों पहले प्रकृति की गोद से ऐसे जादुई रंग निकाले, जिन्होंने पूरी दुनिया के कपड़ों और कलाकृतियों में जान डाल दी।
सिंधु घाटी की प्राचीन सभ्यताओं से लेकर मुगल दरबार की शाही शान तक, भारत के पास ऐसे प्राकृतिक रंग थे जिन्हें पाने के लिए दुनिया भर के व्यापारी और यहां तक कि रोमन सम्राट भी लालायित रहते थे। आइए जानते हैं उन 6 बेशकीमती भारतीय रंगों के बारे में, जिन्होंने प्राचीन दुनिया को सच में 'रंगीन' बना दिया था।

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सुनहरी हल्दी
हम हल्दी की जड़ को भले ही इसकी औषधीय खूबियों के लिए जानते हों, लेकिन सिंधु घाटी सभ्यता के लोग इसका इस्तेमाल एक बेहद खूबसूरत और चमकदार पीला रंग बनाने के लिए करते थे। चाहे आम पहनने वाले कपड़े हों या पूजा-पाठ के वस्त्र, हर जगह इस रंग का उपयोग होता था। यह चमकता हुआ सुनहरा रंग प्राचीन भारत की आध्यात्मिकता, शुद्धता और धूप जैसी ताजगी को दर्शाता था।
ब्लू गोल्ड इंडिगो
आज आप जो आधुनिक डेनिम पहनते हैं, उसकी नींव प्राचीन भारत में 'इंडिगोफेरा टिंक्टोरिया' के पौधे से ही पड़ी थी। उस समय बड़े कुंडों के भीतर इसकी हरी पत्तियों को एक सम्मोहक गहरे नीले रंग में बदला जाता था। कपड़े के इतिहास में इस रंग ने ऐसी क्रांति ला दी कि रोमन सम्राट भी इसके मुरीद हो गए थे। इसी 'नीले सोने' ने आगे चलकर पूरी दुनिया के कपड़ा व्यापार को एक नई दिशा दी।
अखरोट का भूरा रंग
मुगल दौर में ऊनी शॉलों और शाही दरबार के कीमती कालीनों को रंगने के लिए अखरोट के पेड़ की पत्तियों और छिलकों का जमकर इस्तेमाल होता था। प्राकृतिक रूप से टैनिन से भरपूर होने के कारण, यह काले और भूरे रंग के बहुत ही सधे हुए और टिकाऊ शेड देता था। इससे कपड़ों में एक अलग ही शाही लुक और गहराई आ जाती थी।
लाल-भूरी मेहंदी
'लॉसोनिया इनर्मिस' पौधे की पत्तियों से बनने वाली मेहंदी मुगल काल के दौरान शाही विलासिता का अहम हिस्सा बन गई थी। यह न सिर्फ बालों को एक प्यारा लाल-भूरा रंग देने के काम आती थी, बल्कि शरीर पर सुंदर कलाकृतियां बनाने के लिए भी बहुत लोकप्रिय थी। अपने गहरे, उत्सवी रंग और ठंडक पहुंचाने वाले गुण के कारण यह मुगल दरबारों की शान मानी जाती थी।
केसर का राजसी रंग
प्राचीन काल के व्यापारिक रास्तों में केसर को अपार दौलत और सर्वोच्च पवित्रता का दर्जा हासिल था। इससे निकलने वाला चमकीला नारंगी-पीला रंग इतना महंगा और खास था कि इसे सिर्फ शाही घरानों के कपड़ों या तपस्वियों के पवित्र वस्त्रों को रंगने के लिए ही बचाकर रखा जाता था।
मंजिष्ठा का बेहतरीन शेड
आयुर्वेद के रसायन विज्ञान का एक अहम हिस्सा रही 'रुबिया कॉर्डिफोलिया' यानी मंजिष्ठा की जड़ों ने प्राचीन भारत को लाल और गुलाबी रंग के बेहतरीन शेड्स दिए। इस प्राकृतिक रंग की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इससे रंगे गए कपड़े बिल्कुल पक्के होते थे। इन्हीं लंबे समय तक टिकने वाले रंगों की बदौलत उस समय पूरी दुनिया में भारतीय कपड़ों की मांग आसमान छू रही थी।
